Thursday, 29 August 2019

सेल्फी का दीवानापन



सेल्फी का दीवानापन
       सोशल मीडिया पर ऐसे लोग हैं जो हर रोज़ एक ही नहीं, सारे मंचों पर यानी कि इनस्टाग्राम, फेसबुक, व्हॉटसेप सब पर अपनी तस्वीर चस्पा करते हैं|कहीं होटल में खाने गए वहां की तस्वीर, टूर पर जा रहे हैं तो हवाईअड्डे की फोटो, घूमने गए तो.. इमारतों, नदियों, समुद्रतट की फ़ोटो,सबके साथ साझा करते हैं|घरवालों और दोस्तों के लिए तो ठीक है किअलग अलग फोटो भेजने की बजाय सोशल मीडिया पर सबके साथ साझा कर ली पर गैरों को उससे क्या? बच्चों के साथ सेल्फी तो समझ में आती है कि बच्चों का भोलापन चंचलता सबको आकर्षित कर सकती है पर “अपने ही सुहाते हैं” मानने वाले लोगों का तो इन पर भी, ध्यान ही नहीं जाता है| कुछ लोग घर के हर कोने के साथ,घर के बगीचे में,बनाए गए क्राफ्ट के सामान,नए फर्नीचर, विभिन्न व्यंजनों के साथ, कुछ नहीं तो अपने पालतू पशुओं के साथ भी सेल्फी लेकर प्रतिदिन डालते रहते हैं और फिर “मुझे पसंद करो” की गुहार भी लगाते हैं|
        सेल्फी का जूनून इस हद तक आ पहुँचा हैकि ये सूरत के दीवाने अपने चेहरे मोहरे को निखारते ही रहते है|एप्स के ज़रिये त्वचा के दाग धब्बे छुपाते,त्वचा का रंग व चमक बदलते,आँखों व होठों के आकार को बदलते रहते हैं ताकि उनकी तस्वीर सुन्दर से सुन्दरतम हो जाए और कमियां ना दिखें|सेल्फी खींचते वक्त वे उसमें इतना खोये हुए होते हैं कि कई बार बगल से गुज़र रहे व्यक्ति से टकरा जाते हैं या  खुद ही लड़खड़ा कर गिर जाते हैं| चलती गाडी,मेट्रो,पहाड़ों,गुफाओं, समुद्र की लहरों, इमारतों आदिमें सही स्थान चुनने के चक्कर में जान पर खेलने से भी गुरेज़ नहीं करते हैं| उनका मानना है कि ऐसी सेल्फी लोग ज्यादा पसंद करते हैं,लाइक ज्यादा मिलते हैं|
        ये तो हुई तस्वीरों की बात |कुछ वे लोग हैं जो हर रोज़ एक नया सुभाषित विचार-गहन गंभीर हो या कोई भावुक सी बात, अग्रेषित करते रहते हैं|इन लोगों में अधिकतर वे लोग हैं जिनसे हम आमने सामने उतना नहीं मिलते जितना कि इस सोशल मीडिया के मंच पर मिलते हैं| कुछ ऐसे भी लोग हैं जिनसे केवल यहीं मुलाक़ात होती है और इसी आधार पर हम उनके बारे में राय बनाते हैं|
       आम राय यह होती है कि जो लोग अपनी बहुत सारी सेल्फी लगाते हैं, वे आत्ममुग्ध होते हैं| जिसके कारण कई ऑनलाइन दोस्त उनसे बचने की कोशिश करते हैं| जो लोग रोज़ रोज़ सुभाषित वचन भेजते हैं उनके बारे में हम ये मान बैठते हैं की कुछ अपने या उधार के वचनों से वे अपने को विद्वान साबित करने पर तुले हैं| इनके बारे में भी आमराय अच्छी नहीं होती भले ही राय देने वाले ये लोग, खुद भी गाहे-बगाहे सुभाषित वचनों को फौरवर्ड करते नज़र आ ही जाते हैं|
        जो कर रहा है उसे अपना काम करने दीजीये पर उनके बारे में बनी आम राय क्या सही है? मनोवैज्ञानिकों ने इसे समझने की कोशिश की| इस पर शोध किया और परिणाम चौंकाने वाले आये| अमृतवचन और सेल्फी भेजने वालों की ऑनलाईन सक्रियता के साथ ही उनकी मानसिक स्थिति और बौद्धिक स्तर (I.Q) का भी अध्ययन किया गया| शोध में पाया गया कि सेल्फी लगाने वाले लोग, अमृतवचन भेजने वालों के मुकाबले कम आत्ममुग्ध होते हैं| सुभाषित वचनों को भेजने वालों की  आत्ममुग्धता सूरत पर ना होकर अपनी अक्ल व गंभीरता पर होती है|इसके विपरीत सेल्फी लगाने वालों में आत्मसम्मान ज्यादा पाया जाता है| सेल्फी लेने वालों में रचनात्मकता भी ज्यादा होती है| यह भी पाया गया है कि दोनों आदतों का, बौद्धिक स्तर से कोई लेना देना नहीं है| लेकिन जनरल ऑफ रिसर्च इन पर्सनेलिटी में प्रकाशित यह अध्ययन हमें यह नहीं बता पा रहा है कियदि यह बात सच है तो सेल्फी लगाने वालों के बारे में आम राय इतनी खराब क्यों है?
          जब हमें दूसरों की सेल्फी से लेना देना नहीं है तो फिर हम सोशल मीडिया पर उसके ऊपर अपनी प्रतिक्रिया क्यों देते हैं? क्यों लाइक, डिसलाइक या सबस्क्राइब करते हैं – पसंद आया इसलिए, उसे खुश करने के लिए, दया खाकर (शायद उसे आर्थिक लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से ),अपने को महान साबित करने के लिए(क्योकि हमारी सुनी जा रही है भले हमारी अपनी ही नज़र में ये तारीफ़ झूठी ही क्यों न हो),खाली बैठे आसान से काम में व्यस्तता का दिखावा करने के लिए या फिर खाली टाईमपास करते हैं|
       सेल्फी की अधिकता का कारण मेरी समझ में निम्न हैं| पहला ----पिछले दशक में सोशल मीडिया का विकास तेज़ी के साथ तो हुआ ही है,विभिन्न सुविधाओं से लैस मोबाइल कैमरोंके साथ-साथ खींची गयी तस्वीरों के कांटछांट करने वाले ऐप बढ़िया से बढ़िया होते जा रहे हैं जिससे रचनात्मकता को बढ़ावा मिला है| यही रचनात्मकता व्यक्ति को जुनून की हद तक ले जा रही है| दूसरा--एक ऐसी पीढी हमारे सामने है जिसने इतनी संख्या में तस्वीरें खींची हैं जितनी कि कैमरे के आविष्कार के बाद, पिछली सारी पीढ़ियों की कुल जमा तस्वीरें भी इतनी संख्या में नहीं थीं|ऐसा इसलिए हुआ कि इसमें होने वाला खर्च न्यूनतम हो गया, फ़ोटोग्राफ़र पर निर्भरता भी नहीं रह गयी है|तीसरा ---सेल्फी खींचने वालों का मानना है कि ये ध्यान आकर्षित करने में ज्यादा कामयाब होती हैं| लोगों की प्रतिक्रिया भी सेल्फी को ज्यादा मिलती है| रातोंरात स्टार बनने की चाह भी पूरी हो सकती है|
मनीषा सक्सेना
जी १७ बेल्वेडीयर प्रेस कम्पाउंड
मोतीलाल नेहरू रोड
प्रयागराज २११००२

Saturday, 24 August 2019

व्हाट्सेपीया जन्माष्टमी


व्हाटसेपिया जन्माष्टमी
जबसे स्मार्ट फोन आये हैं हम जैसे रिटायर्ड लोगों का दिन का अधिकाँश भाग माला की बजाय उसी पर उँगलियाँ फेरते बीतता है|बच्चे तो नौकरियों के चक्कर में उत्तरप्रदेश से बाहर हैं| बहुत पास हुए तो नोएडा या गुडगाँव मेंपाये जाते हैं नहीं तो चिन्नई, हैदराबाद, बंगलौर पूना या अहमदाबाद|घर की साफ़ सफाई से लेकर तीज -त्यौहारों के लिए शनिवार इतवार का मुंह ताकते रहते हैं और यहाँ हम यहाँ बुज़ुर्ग जवान व्हाटसेप पर अपनी दुनिया विभिन्न ग्रुप में शामिल होकर खुशियाँ मनाते हैं जैसे ननिहाल, ददिहाल, स्कूल फ्रेंड्स, कॉलेज ग्रुप, परिवार, इलाहाबादी, चुंगी, कटरा किटी, हम साथ साथ, इसके साथ ही पचासों मित्र व अड़ोसी- पड़ोसी|
          सुबह ५ बजे से ही जन्माष्टमी की बधाईयाँ व शुभकामनाएं आने लगी |सुबह देखकर ही मन प्रसन्न हो गया|स्टीकर, एनिमेटिडफिल्म, कृष्णजी की नैतिक सूक्तियों में खो ही रही थी कि मथुरा के ननिहाल ग्रुप के (पांच मौसी व दो मामा उनके बच्चे और फिर उनके भी बच्चे व कुछ की बहुएं व दामाद भी यानि कि पचास साठ लोग घर के ही) सूत्र धार मेरी मां व मामा|मां का ऑडियो आया ......मैं तो गोकुल नगरिया जाउंगी नंदरानी से बधाई ले के आउंगी ,,,वाऊ मौसी ,वाह दीदी आपकी आवाज़ में तो जादू है .....इस उम्र में इतना सुरीला गीत.......ननिहाल की लतामंगेशकर ......| मौसी आपका गीत सुनकर मुझे भी याद आया मम्मी ने छठी क्लास में हारमोनियम पर सिखाया ,,,,बरजो बरजो न श्यामबिहारी रे ,मैं तो यशोदा से करुँगी पुकार रे.......हाथ मिलाओ दीदी बचपन के दिन याद आ गए .......बहुओं जागो ...सास व नन्द का पलड़ा भारी हो रहा है .......झूम झूम मन मोहन रे ,मुरली मधुर सुनाये जा ......वाह भाभीजी कितना पुराना गाना ......नानी-नाना के साथ दशहरा मैदान में ये पिक्चर देखी थी|........जन्म लियो है कन्हिया ,गोकुल में बाजे बधईया........छोटी भाभी क्या कमाल  का गाना सुनाया मथुरा के आँगन की यादें ताज़ा हों गई भैंसवाली ने क्या ढोलक बजाई थी और मिश्राइन के ठुमके ...वाह वाह.......”नंदलाला हो ,नंदलाला हाय.... मार जाए केसर के फुलवा” .......ये गाना याद है... आकाशवाणी पर दोपहर में महिलाओं की लिए कार्यक्रम आता था, उसके लिए तैयार किया था|पंद्रह दिन रोज़ शाम को प्रेक्टिस की थी|सबसे छोटी मौसेरी बहिन का ऑडियो आया .....श्याम मरो छलिया, बची रहियो गौरी..... वही बिंदास आवाज़ व गाने का स्टाइल | ममेरी भाभी ने तुरंत उत्तर दिया .....सांवरी सूरत पे मेरा दिल दीवाना हो गया .......अच्छा जी, भैया पर गाना गाया है|हमारे घर के नगीने......गुमनामी में खोये कलाकारों को आगे लाने का मंच है हमारा परिवार ......ननिहाल नाम बदल कर “सुरीला हमारा ननिहाल” हो गया ....साथ ही आँख मारती इमोजी व हाथ मिलाता हाथ भी...... फिर श...श.... |मौसेरी, ममेरी बहनों की इशारेबाज़ी भी अभी चल ही रही थी कि...... मेरी बहु ने गाया है .....अचुतम केशवं कृष्ण दामोदरम......अहो भाग्य हमारे ....तीसरी पीढ़ी भी सुरीली ...यशोमती मईया से बोले नन्द लाला .......मेरी भी गाती है .......मईया यशोदा ये तेरा कन्हिया .......प्लीज़ कान बंद करके सुनियेगा......... बड़ा मज़ा आ रहा है.......मम्मीजी ऐसे भी सबसे मिल सकते है सोचा नहीं था कभी |
 श्रीमानजी बडबडाते हुए बोले आज खाना वाना नहीं मिलेगा क्या दिनभर फोन पर लगी रहती हो ......ननिहाल की जन्माष्टमी का सुख तुम क्या जानो इलाहाबादी बाबू .......लो देखो कुछ भी कॉपी पेस्ट .....तुम्हारे शब्दों में ....इधर का उधर नहीं है सब ओरिजनल है,कह कर फोन थमाया ....कहाँ हो .......चलो खाना खाएं ......वाकई मान गए पर एक बात तो है...... लोकगीत से फ़िल्मी गीत का ये सफ़र नानीजी देख लेती तो दुखी ज़रूर होती ........नहीं जी .....कहतीं .....बहुओं को आये दिन ही कितने हुए हैं, घर में रहकर सब सीख जावेंगी .......घर में रहें और सीखना चाहे तब ना .........|
मनीषा सक्सेना
जी १७ बेल्वेडीयर प्रेस कम्पाउंड
प्रयागराज