लघुकथा ३२ मैं और
मेरा समय
समय सीमा
मैं और मेरा समय
अक्सर बातें करते हैं कि तुम मेरे पास होते तो मैं ये करती, मैं वो करती और आज हालात ये हैं कि सुबह
से शाम कुछ ऐसा करते बीत जाती है जो कतई आवश्यक नहीं है|
“मुझे याद है समय जब
तुम बातों की साझेदारी से हम सबको एक सूत्र में बांधे रहते थे जो आज भी मुझे गुदगुदाती
हैं|”
“हाँ तब आपसी रिश्ते
तो लम्बे समय तक या ये कहूँ कि जीवन भर साथ निभाते थे|”
“आज तुमने मुझे अपनी
ही सीमाओं से ऐसा बाहर निकाला है कि मैं डाल डाल तो तुम पात पात, मुझसे आगे ही रहते
हो|”
“मैंने तो तुम्हें
आगे बढ़ने की प्रेरणा ही दी है|”
“प्रेरणा के साथ ही तुम
मुझे थमाते जाते हो नए नए उपकरणों का पुलिंदा| जिसमें मैं इस कदर उलझ कर रह जाती
हूँ कि अपनों की बात तो दूर, खुद अपने लिए ही मुझे फुर्सत नहीं है| मजबूरी या
स्वार्थवश किसी से मदद की गुहार लगाऊँ तो वो भी पलट कर कहता है, समय नहीं है| सांस
लेने की फुर्सत तो हैं नहीं, काम क्या करें ख़ाक|”
“ये तो तुम्हारा
अपना सोचना है”
“मेरे साथ की सब
सीमाएं भी आगे बढ़ने की होड़ में दौड़ती जा रहीं हैं| आज फलां चीज़ का समय है तो मैं
उसके आगे वाले समय पर येन केन प्रकारेण कब्जा कर लूं|” “
“इस आगे बढ़ने की दौड़
में कोई मंजिल नहीं है| तुम्हें कोई ठिकाना नज़र आ रहा है?”
“मैं तो ये सोच भी
नहीं पा रही हूँ कि आखिर इसकी ज़रूरत हमें है भी या नहीं? है तो
क्यों? यदि नहीं है तो हम इसके पीछे भाग क्यों रहे हैं? हांफते हांफते नकारात्मकता
भी मन में भर रही है कि क्या हम बस इसीलिए भाग रहे हैं कि दूसरों से पीछे ना रह
जाएँ|”
“इसी सोच के कारण
तुम मुझे ही पछाड़ने में लग गयी हो| यह भी
भूल गयी हो कि तुम मुझे पछाड़ नहीं सकती, तुम तो क्या नियति भी मुझे पछाड़
नहीं सकती|” समय ने धीरे पर दृढ़ स्वर में कहा|
“समय, मेरी भी कुछ
सीमाएं हैं इन सीमाओं से मैं बाहर नहीं जा
सकती|”
“मैं तुम्हें अवसर
देता हूँ, फुरसती पल देने की कोशिश करता हूँ, जिंदगी में ठहराव लाने की कोशिश करता
हूँ|”
“अच्छा समय, अब एक
काम करो, तुम संकेत दो ताकि हम तुम्हारे सिद्धांत को समझें तभी मेरे स्व का
अद्भुदय होगा तभी हम दोनों साथ साथ सुकून की सांस ले सकेंगे|”
“रहने दो, अभी तो बस
तुम अपनी व्यस्तताओं का बहाना मार कर, मजबूरी व स्वार्थवश मुझसे ही होड़ लगाकर
मुझको ही छल रही हो और इसीलिए तुम मेरे पीछे आने को मजबूर हो|”
“समय कहते हैं कि,
तुम बड़े से बड़ा घाव भर देते हो| तुमने तो नए नए सपने दिखाकर और नई नई चीजें थमाकर
ऐसा घाव दिया है जिससे हम अपने घाव और बढ़ा लेते हैं और सच में अब तो तुम्हीं से
होड़ लगाने लगे हैं|”
“इतनी ठोकरें खाने
के बाद अब यह तो समझ में आ गया होगा कि तुमको
फिर से अपनी सीमाओं में बंध जाना चाहिए पर..... सोचने और करने में बहुत फर्क है|”
“समय, तुम्हारी सीमा
तो अनंत है पर यदि मैं तुम्हें समय सीमा में बाँध लूं तो मैं सुकून पा सकती हूँ|
यही मेरा सकारात्मक पक्ष है| अतः अब मैनें
यह दृढ़ निश्चय कर लिया है कि मैं तुम्हें समय सीमा में बांधूंगी, इससे मेरी
ज़िन्दगी भी सवंरेगी और हमारी भी|”
तब से आज तक समय
सीमा के साथ ख़ुशी ख़ुशी बंधा हुआ है|
मनीषा सक्सेना
प्रयागराज
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