लघुकथा ३४
अरमानों के मोहरे
सालभर से हर शनिवार
को टी वी पर संगीत का प्रोग्राम आता है जो कि हम सास बहू का पसंदीदा है। सारे काम निबटा
कर हम दोनों इसको ज़रूर देखते हैं। आज इस बच्चों के संगीत कार्यक्रम का फायनल राउंड
चल रहा हैं| एक घंटे का प्रोग्राम का समय भी
बढा कर चार घंटे कर दिया गया है। शुरूआत से दिखाया जा रहा है कि किस तरह से
विभिन्न राज्यों से आये लाखों बच्चों में से केवल ५ बच्चे इस अंतिम पड़ाव तक पहुंचे
हैं| इन बच्चों की कार्यक्रम विशेष से जुड़ने की कहानी दिखाने के साथ ही उनके मेंटर
कितनी मेहनत व लगन से अपने प्रतियोगियों को तैयार करते हैं ----बार बार दिखाया जा
रहा है| फायनल प्रोग्राम से पहले बच्चों को ४ महीने बाद माता पिता से मिलवाया गया
है तो उनकी ख़ुशी भी छोटे परदे पर दिखाई गई| नामी गिरामी कम्पनियों ने लाखों के
इनाम इन छोटे –छोटे प्रतियोगियों के लिए रखे हैं---- बार बार स्क्रीन पर दिखाए जा
रहे हैं | सबसे छोटा ६ साल का प्रतियोगी
जो कि सारे देश का चहेता बन गया था उसके बारे में सूत्रधार ने कहा कि यह अब स्कूल
नहीं जाना चाहता केवळ गाना ही गाना चाहता है और परदे पर बड़े इठलाते हुए उसने हामी
भरी तो जज साहिबा ने दिखावटी क्रोध दिखाते
हुए उससे स्कूल जाने का वायदा लिया| स्कूल के बच्चों की छोटी सी फिल्म भी दिखाई
गयी कि उसके साथी कैसे उसे उत्साहित करके बुला रहे हैं| यह सब देखकर पता नहीं मन
कुछ खराब सा होने लगा, शोर शराबा सा लगने लगा| खाना खा रही अम्मांजी से मैंने बस इतना
ही कहा “आप सही कहती थी कि बहू अपनी छोटी की आवाज़ में बहुत मिठास है इसे सबके
सामने मत गवाया कर, बच्चे को नज़र लग जाती है”| अम्मांजी ने ठंडी
सांस भरकर कहा खाली नज़र ही नहीं लगती है ....
आजकल तो बिचारे ये बच्चे बड़ों के अरमानों का व्यावसायिक मोहरा बनकर रह गए हैं” -----कह कर बगल में
रखा टी वी का रिमोट दबा दिया|
मनीषा सक्सेना
प्रयागराज
एकदम सही देखने में अच्छा लगता है पर बच्चों का भविष्य खराब हो रहा है बहुत कम ही ऐसा करियर बना पाते हैं जो अपनी कमाई से घर चला सकें। बहुत अच्छा सत्य उजागर किया है। बधाई।
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