गुब्बारा
दिया गुब्बारा छोटू
को
चमक आई आँखों में
खुश हो देखा और
किलका,
छुआ नन्हें हाथों ने
गोदी में चढ लपका
उसको.
उतरा झट, भागा था वो
टकराया तो फूटा
गुब्बारा,
देख उसे खुद फूटा वो
बहलाया, समझाया,
नया
गुब्बारा उसी से फुलवाया।
खेलता कूदता फोड़ता
था वह हर रोज़
गुब्बारा।
जश्न मनाता फुलाता
फिर वो एक नया
गुब्बारा
हम दोनों के ही सपने
थे अब गुब्बारे,
साधते, फोड़ते और
सहेजते थे गुब्बारे
खुश थे दोनों अपनी
ही दुनिया में
फलते फूलते बन गये
खुद गुब्बारे
अब जब महामारी का
खौफ छाया है
गुब्बारा फिर राहत
बनकर आया है
खुद को ढाढस बंधाती
हूँ गुब्बारे से
ताकत बढ़ाती हूँ अपनी
ही फूंक से
फुलाती हूँ गुब्बारे
सुबह औ शाम
करता नहीं वो, गुब्बारे का काम तमाम
डरता है वो, कंहीं फूट न जाए मेरा गुब्बारा
क्यूँ फूटेगा, जब हाथ में है मेरे गुब्बारा
ढाढस बंधाती हूँ उसे
फिर गुब्बारे से
फेफडे अपने मज़बूत करती हूँ गुब्बारे से
गुब्बारे फुलाकर
साँसें बढाती हूँ मैं अब
जन्मदिन का उपहार, खुद होती हूँ मैं अब
डरा हुआ बेटा फिर
छोटू बन गया है
घर आँगन में फिर
गुब्बारा आ गया है
स्वरचित
मनीषा सक्सेना
प्रयागराज





अति सुंदर और दिल छूने वाली कविता और बहुत प्यारी photos
ReplyDeleteबहुत धन्यवाद दीदी।
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