जन्मदिन का उपहार
हाथ थाम खड़ी हुई पहली बार
गदगद हो पग बढ़ाऊं बारंबार
बना लिया था खेल,कोशिश करती
मुठ्ठी में आती जब भी कोई डंडी
हुआ विश्वास अपने पर,
जितनी बार गिरी भू पर
फिर कोई मिला सहारा
बड़ों ने प्यार से पुचकारा
खड़ी हो विकल्प नया देखती
टेबल कुर्सी तकिया या पाटी
घुटने घुटने चलकर जाती
उठती गिरती पकड़ती चलती
सन्तुलन बना कोशिश फिर करती
लिया मैंने अब बहुत सहारा
बनाया लक्ष्य मैंने दोबारा
अपने पैरों पर खड़ी मैं होऊंगी
जहां हो मर्ज़ी मैं चलूंगी
जन्मदिवस पर ये उपहार
दिया सबको पहली बार
बिना पकड़े मैं तो चली
डगडग डगडग मैं भली
फोटो खिंची हजारों बार
विश्वास बढ़ा जब ताली बजी
लगी मुझे चलने की धुन
सारे घर में रुनझुन रुनझुन
गद्दा घास बालू कंकड़
हवा हो या पानी के अंदर
सब पर अपना पैर धराया
नया अनुभव मुझे ये आया
नया लक्ष्य फिर रोज़ बनाया
सोचूं अब मैं खड़ी खड़ी
चढ़ पाऊंगी चढ़ाई खड़ी?
मनीषा सक्सेना
१८/०७/२०२२

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