लौकडाउन के अनुभव भाग २
बगिया से सम्बन्ध
बगिया से मेरा नाता
बरसों पुराना है| गृहप्रबंध में स्नातकोत्तर होने के नाते किताबी ज्ञान
तो था पर पेड़ पौधों के बारे में प्रायोगिक
ट्रेनिंग शादी के बाद ही शुरू हुई| पति को पेड़ पौधों से लगाव जुनून की हद तक,
रेलवे में चिकित्सा अधिकारी होने के कारण मिला हुआ बड़ा सा सरकारी बँगला, बगिया के
लिए कर्मठ सरकारी माली, किचन गार्डन के लिए आउट हाउस में माली परिवार, हमारे शौक
को बहुत अच्छे से पूरा करने में सहायक थे| साहब तो सुबह अस्पताल जाते वक्त माली की
निर्देश देकर चले जाते और मैं मेमसाहब का चोला उतार कर मेहनती छात्रा की तरह, माली
को काम करता देखती और व्यवहारिक जानकारी प्राप्त कर खुद अपने हाथों से करती रहती|
धीरे धीरे कलम लगाना, गूटी बांधना, एक ही पेड़ से कटिंग करके नए पौधे बनाना, मौसमी
बीजों को सहेजना, गमले की रीपौटिंग करना..... जैसे सारे हुनर माली से सीखती गयी|
जिसका नतीजा ये हुआ रिटायर होने के बाद जब हम प्रयागराज अपने घर आये तो हमारे पास
अपने बनाए हुए हर प्रकार के पेड़ पौधे, और मौसमी फूलों के बीज थे| नहीं था तो बस
मेरा कर्तव्यनिष्ठ माली|
अब तलाश हुई माली की जो हमारे लिए मेड़ें बनाकर
क्यारियाँ बना दे, और गमलों की निराई गुड़ाई कर दे| हाय रे हमारी किस्मत जो माली
आता वो हफ्ते में एक दिन आने की बात करता, पानी डालकर आधे घंटे में जाने की बात
करता| बड़ी मुश्किल से हमें ये माली मिला जो रोज़ आने को तैयार हुआ| उसे सख्ती से
कहा गया, पानी हम लोग खुद डालेंगे तुम बस निराई, गुड़ाई और सूखे पत्तों बटोर कर खाद
वाले डब्बे में डाल कर जाओगे|
छोटी सी बगिया में अपने हाथ से फल-फूल के साथ
शोभाकार,सदा बहार सब तरह के पौधे लगाए| जहाँ भी जाते वहां से पौधों को लाकर अपने
यहाँ रोपते| वो कहावत है ना हमारे देश में हर कोस पर पानी व बानी बदल जाती है और वही
बात हमारे यहाँ है..... हर दूसरे कदम पर रंग, गंध, व द्रश्य बदल जाता है| खैर छोटी सी बगिया में इतने पेड़ पौधे लग गए कि हर
मौसम के हिसाब से एक पेड़ की कटिंग करते ताकि दूसरा बढ़ पाए| बिगड़ते पर्यावरण के साथ
कदम से कदम मिलाते हुए हम अपनी बगिया को बखूबी संवार रहे हैं|
सामने खड़े होकर काम कराने के चक्कर में
मेरा मेमसाहब वाला रूप कुशाग्र छात्रा के रूप पर कब हावी हो गया, पता ही नहीं चला|
नतीजा ये हुआ कि पानी डालने जैसा सरल काम भी माली के सुपुर्द हो गया| हमारी छोटी
सी बगिया जंगल का रूप लेने लगी| कभी हम मौसम को कोसते तो कभी माली को डपटते तो कभी
अगल बगल के घरों को दोष देते कि इन लोगों ने अपनी मंजिलें बना कर हमारी धूप रोक दी
पर अपनी गलती नहीं देख पाते | दूरदर्शन किसान
पर आने वाला प्रोग्राम “छत्त पर बागवानी” के नियमित दर्शक रहे| यु ट्यूब पर भी
प्रोग्राम देख कर हमारी जानकारी तो खूब बढ रही थी पर घर के कामों के बीच माली को
आदेश देकर मैं दूसरे कामों में लग जाती थी|
पतिदेव पेड़ पौधों की कटिंग करके बगिया को संभालने
की कोशिश करते| इस बार की लम्बी सर्दी के चलते, बाहर से लाये पौधे भी खराब होने
लगे| घर की शान सुपारी के पेड़ की पत्तियां भी गिर गयी| इस समय पतिदेव का धैर्य व
आशावादी दृष्टिकोण देखने लायक था .....“देखना बसंत के बाद फिरसे पत्तियां आ
जायेंगी|”और सच में नवरात्रि के बाद उसमें पत्ती अंकुरित हो गयी, हम बहुत खुश| इसी के बाद करोना वायरस का आक्रमण और
उससे बचने के लिए लौक डाउन लागू होना और जिसके कारण बाई व माली का आना भी बंद हो
गया| सूखी पत्तियों का ढेर मुझे चिढाता| ये सब देखकर मुझसे रहा नहीं गया और फिर
मेरा छात्रा वाला रूप मेमसाहब को पीछे करके आगे आ गया| स्टूल पर बैठकर रोज़ थोड़े
थोड़े गमलों की खरपतवार हटाती| कूड़े उठाने वाले से मिन्नतें करके पत्तियां एक जगह
इक्कठा करवा लेती| फिर गुड़ाई करके जमा की गई पत्तियों को गमले पर बिछाती| पतिदेव सुबह शाम
पानी डालते और पौधों की कटिंग करके उनको सही आकार में रखते| इस प्रकार हमारी बगिया
फिर से पुराने रूप में आने लगी है|
भला हो इस लौक डाउन का जो माली का आना बंद
हो गया| घर में फली सेम को उचक उचक कर तोड़ने का जो आनंद आया क्या कहूँ ....अड़ोसी
पड़ोसी को बाँटते बाँटते भी ख़त्म नहीं हो
रही थी| मानों मुझसे शिकायत कर रही थी देखो तुमने तो मुझे पानी भी नहीं डाला पर मैंने
अपने कर्तव्य को पूरा निभाया| बसंत के बाद मेरा पसंदीदा मोगरा पूरे शबाब पर है| बेडरूम
के बगल में दिनभर गमकता है| गेट के पास लगी रात की रानी की तेज़ मीठी गंध अपने पास
बुलाती है| गमलों में छोटी बड़ी चाँदनी भर भर के खिल रही हैं| नींबू की छाया में
लगा शान्ति का प्रतीक सफ़ेद लिली मानों सर उठा कर कहता है देखो बिना धूप के भी मैं
खिल गया .......देखना करोना के विरूद्ध छिड़ी इस लड़ाई में भी हम ज़रूर जीतेंगे |
रेगिस्तान का राजा अडेनीयम लाल गुलाबी फूलों से भर गया है जो मुझे छत पर खींच ही
लेता है| फालसे में ढेरों पीले फूल कहते हैं हर साल की तरह इस बार भी मेरा शरबत
पीना| महानगरों में तो नई पीढ़ी के बच्चे मेरे स्वाद को जानते ही नहीं है| अन्गूर की
बेल अपने फलों को बड़े बड़े पत्तों के बीच छुपा कर आंखमिचौनी खेलती है मानों कह रही
है...... ढूँढो तो जाने| मिर्ची गुडहल भी लाल फूलों से लद गया है क्योंकि पूजा में
चढाने के लिए अब कोई माँगने नहीं आता| कदम कदम पर रंग,गंध व् द्रश्य बदल बदल कर
सुखद अहसास देते है| मैं सुबह की गुनगुनी धूप में बरामदे में बैठ कर प्राणायाम
करती हूँ| उसके बाद ताज़े लेमन ग्रास से बनी ग्रीन टी को मज़े ले ले कर पीती हूँ|
काम करने वाली बाई भी आकर मेरे आनंद में खलल नहीं डालती| गर्मियां थोड़ी थोड़ी शुरू
हो गयी हैं पर चारों समय मैं गरम पानी में, बगिया का पुदीना या ऑलस्पाइस के पत्ती
डालकर, तुलसी अदरक की चाय पी कर, अपने को वायरस से बचाने की कोशिश करती हूँ| मेरी
छोटी सी बगिया कोरोना वायरस से दो दो हाथ करने के लिए प्रतिरोधक क्षमता बढाने में,
मेरा पूरा साथ देती है| इस तरह हम दोनों घर में सुरक्षित अपने को तैयार कर रहते हैं|
धन्यवाद लौक डाउन तेरा
जो माली न आया मेरा|
मनीषा सक्सेना
प्रयागराज







बहुत सुंदर वर्णन।Enjoy.
ReplyDeleteहाँ बहुत मज़ा आरहा है।
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