Tuesday, 2 May 2017

वंचित

                                वंचित
नानी माँ की तेरहवीं पर आखिरकार मैं पहुँच ही गई|आँगन में सफ़ेद पंडाल लगा है ,कुर्सियों पर सफ़ेद कवर चढ़े हैं|बड़े मामा साजसज्जा का पूरा ध्यान रख रहे हैं|
“सफ़ेद गुलदाउदी की मालाएं फोटो के पीछे परदे पर लगाओ’
लोबान की धूपबत्ती पूजा में रखो और फोटो के सामने चन्दन की अगरबत्तियां लगेंगी’
“बड़े भैया अम्मा की पसंद का सारा खाना बनवाया है ,तीन तरह के अचार ,मीठी सौठ,मीठे में हलुए के साथ साथ आमरस भी बनवाया है|”पता नहीं भैया फिर भी लगता है जैसे अभी अम्मां बोल पड़ेंगी छोटे ये और कर लेता |अम्मां बहुत कायदे से सारा काम करती थीं|” “हाँ छोटे तू तो पूरा अम्मां के ऊपर गया है तभी तो तेरा नाम अम्मां ने इंतजामअली रखा था |” मेरे ऊपर मामा की दृष्टि पड़ी तो लपक कर मेरे पास आये ---
“अरी बिट्टो अच्छा हुआ तू आ गयी आखिरी सांस तक तेरे ही नाम की माला जप रहीं थीं,मालती जीजी तो रहीं नहीं ,बस तुझे ही बुलाने की जिद कर रहीं थीं |बार बार कहती थी की एक वही तो मुझे समझे है |”अब इतनी जल्दी भी तुम आ नहीं सकती थीं, पिछले हफ्ते ही तो मिलकर गयी थीं|” “हाँ मामाजी”मैंने निःश्वास छोड़ी |
             अन्दर पहुंची तो छोटे बड़े सफ़ेद मोतियों की माला मामियां व मौसियाँ मिल कर बना रहीं थीं साथ में बातचीत भी जारी थी “अम्मां को मोती इतने पसंद थे  कि हर रंग की साडी के साथ वे  मोती का सेट पहनती थीं|” “जीजी इसीलिए हमने सोचा है कि अम्मा की फोटो पर चन्दन की बजाय मोती की माला पहनाएंगे |’’ अम्मा इतनी सफाईपसंद थी कि हर काम के लिए अलग तौलिया अथवा झाड़न रखती थी ,हाथ के लिए अलग ,पैर पोंछने के अलग ,मुंह पोंछने के लिए अलग टॉवल होता था|कुछ झक्की भी हों गयी थीं |” “जीजी आप झूठ मानेगी पर जब नर्स नहला कर जाती थी तो एक बार में वाशिंग मशीन में सिर्फ उनके ही कपड़े धुलते थे |” “कुछ भी कहो अम्मां ने अपना बुढापा बेटे बहुओं ,नाती पोतों की सेवा लेते हुए चैन से काट लिया |”
                 हमेशा खुश रहने वाली नानी के मुख पर उदासी क्यों रहती थी? पिछली बार जब मैं यहाँ आई थी तब मैंने उनसे पूछा भी था | नानी बोली “बिट्टो काम तो मेरे सब हों रहें हैं,खाना,पीना,ओढना,बिछाना सब घड़ी की मुताबिक़ चल रहा है पर मेरे पास बैठने के लिए किसी के पास समय नहीं है, अपने मन की बात मैं किसी से नहीं कर सकती ,कभी कभी मन इतना उदास हो जाता है की फोन पर भी बात करने की  इच्छा नहीं होती, लगता है मैं सबके लिए बोझ हो गई हूँ | काम सब हो रहे है और समय पर हो रहे हैं पर रोबोट की तरह सब आते हैं ,जाते हैं |इतने भरेपूरे परिवार के होते हुए भी लगता है मैं अकेली हूँ ,बिट्टो इन सबको मैं कैसे समझाऊं कि शरीर की टूटन से आदमी इतना नहीं टूटता है जितना उपेक्षित रह कर टूटने लगता है |
              मुझे लगा अभी नानी फोटो में से बोल उठेंगी “मेरी जितनी भी अपेक्षाएं हैं खानेपीने की ,सलीके से जीवन व्यतीत करने की,ढंग से रहने की ,ये सब इसलिये हैं ताकि मैं तुम सबसे बातचीत कर सकूँ,अपने मन की बात कह सकूं |”

               

7 comments:

  1. दिल को छू लेने वाली बहोत अच्छी

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    1. धन्यवाद, कृपया अपना परिचय दें।

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    1. धन्यवाद, कृपया अपना परिचय दें।

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  3. मर्मस्पर्शी रचना।बुजुर्गों का सच्चा दुःख उभारा गया है।

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    1. उत्साह वर्धन हेतु शुक्रिया।

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  4. अत्यंत मर्मस्पर्शी

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