मोबाइल ठलुआ
आपने एयरटेल का वो
विज्ञापन तो देखा होगा जिसमें एक पिता अपने बेटे से कहता है कि फलां –फलां बिल भर
कर आना| शाम को आकर पूछता है बिल भरा कि नहीं| वह उसी ढंग से औंधा होकर सोफे पर
पसरा होता है जैसे कि वह पिता के ऑफिस जाते वक्त था| पिता झल्ला कर उसकी माँ से कहता है, मैं ऑफिस जाता हूँ तुम
अपना काम करने जाती हो पर ये साहबजादे क्या करते हैं? एक बिल भी जमा नहीं कर सकते
तो वह तुरंत बेपरवाही से कहता “हो गया” पर उसकी भाव भंगिमा जरा भी नहीं बदलती है| इस
शख्स को देखकर मुझे अपने दादाजी की याद आई जो ज़रा भी हम लोगों को खाली बैठा देखते
थे तो कहते थे “क्या ठलुआ से बैठे हो” कुछ करो|
आजकल इस तरह के ठलुओं की एक विशेषता
यह है कि सबके हाथ में एक अदद मोबाइल ज़रूर होता है और वो हर जगह दिखाई देते हैं| राह
चलते ,चौराहों पर खड़े ,बस स्टॉप पर बैठे , मेट्रो में सफ़र करते हुए, महानगरों में
आपके अगल-बगल हर जगह ये अपनी मोबाइली धुन में रमे दिख जायेंगें| कहा तो यहाँ तक
गया है कि जिस प्रकार तरकारी में अलुआ, पकवान में हलुआ, जानवरों में भलुआ, शरीर के
अंगों में तलुआ, कुत्तों में कलुआ होता है उसी प्रकार ये माँ का ललुआ सर्वसाधारण
में ठलुआ होता है|
ये बहुत ही विशिष्ट
होते हैं| घरों में ज्यादातर अधलेटे, सोफे या कुर्सी के एक और पसरे हुए रहते हैं|
यदि आप इनसे मिलने जाएँ तो ये आपकी तरफ देखेंगे ही नहीं| इनकी निगाहें मोबाईल की
स्क्रीन पर होती हैं और हाथ, अंगुली व् अंगूठे की सहायता से जल्दी-जल्दी मोबाईल
“की” पर खेल रहे होते हैं| कानों में ईयरफोन लगा होता है| आप उनके सामने पहुंचें
और कहें, “कहो कैसे हो?” यदि वे उसी मुद्रा में यथावत रहें तो समझये वे बहुत जरुरी
काम कर रहें हैं, आप उन्हें करने दीजिये| यदि उन्होंने आँख मिलाई व हल्की मुस्कान
चेहरे पर आई तो समझिये उनका मूड अच्छा है | यदि वे उठकर बैठे तो समझिये कि वे आपका
आदर करते हैं और यदि कानों में से ईयरफोन हट जाए तो आप गदगद हो जाइए कि आपका दिल
खोल कर स्वागत हुआ है|
ये मोबाइली ठलुए ,ठलुए
होते हुए भी बहुत काम करने का माद्दा रखते हैं | कोई काम जो आप न कर पा रहे हों आप
इन्हें दे दीजिये, ये कुछ ही देर में कर देंगें| जैसे, आपको रेल का टिकट नहीं मिल
रहा हो, तुरंत पिक्चर का टिकट चाहिए हो, बिजली पानी का बिल जमा करने की लाईन लम्बी
हो तो ये मोबाईल पर बैठे-बैठे हर काम खुशी-ख़ुशी कर देंगे| पर यदि आपने ऐसे काम दिए
की जाओ सब्जी ले आओ तो इनकी कोशिश होगी कि सब्जीवाले को फोन कर दें और सब्जी मंगा लें| यदि ये सुविधा नहीं हुई तो
सब्जी बाज़ार जाकर पूरी मंडी का वीडियो आपको भेजेंगे फिर पूछेंगे “क्या लूं?”
ये रईस खानदान से होते हुए भी सस्ती
से सस्ती चीज़ या फ्री का माल कहाँ और कैसे मिलेगा, सबकी जानकारी रखते हैं जैसे किस
स्कीम में फ्री के कितने कॉल व मैसेज मिलेंगे, सैकेंड हैण्ड फर्नीचर ,घर का सामान,
इलेक्ट्रौनिक उपकरण सबसे सस्ते कहाँ मिलेंगे, ये सारी जानकारी इन्हें होती है|
बाज़ार जाने की ज़हमत ये नहीं उठाते हैं, घर पर सामान मंगवाने में यकीन रखते हैं |
इनका एक परम धर्म है चर्चा करना| ये
चर्चा पर चर्चा करेंगे इनको जो भी थोडा सा अलग या अनोखा लगेगा उसकी चर्चा करते
रहते हैं| इनके अपने विचार क्या हैं ये जानना बड़ा मुश्किल काम है| ये दूसरे के
विचारों को मानने में यकीन रखते हैं इसलिए इनके विचार हमेशा बदलते रहते हैं| ये
दूसरे के विचारों को, सुबह गुडमोर्निंग से लेकर गुडनाईट तक पढ़कर, अपने जैसे दूसरे
ठलुओं को भेजते रहते हैं| जिस प्रकार धोबी समभाव से रूमाल से धोती तक, पायजामे से
गंजी तक धोता है उसी प्रकार ये मोबाईल ठलुए सारे विषयों पर चर्चा करते हैं| ये
किसी का अपमान नहीं करते और न ही किसी की अवमानना| ये किसी का हक नहीं छीनते न ही
किसी पर हक जमाते हैं| इनके पास जो कुछ हैं वह सबके लिए है और सबका जो है वह इनका
है| इस अर्थ में ये साम्यवादी हैं| इनका जब जैसा मूड होता है उसी प्रकार ये काम
करते हैं पर हर काम मोबाईल से होना सुनिश्चित है| यदि ये दुखी हैं तो रोते नहीं और
यदि रोयें तो उसमें हंसने का आनंद लेते हैं| कितनी भी मुसीबत में हों पर हंसने की
वजह उसमें निकाल लेना इनका सबसे बड़ा गुण है| ये ज्यादा समय तक परेशान नहीं रह
सकते| कपिल या राजू के लॉफ्टर शो की तर्ज पर हँसते हुए खुद तो चिंता मुक्त हो जाते
हैं और सारी चिंताएं दूसरों के हवाले कर देते हैं|
ये प्राकृतिक सौंदर्य के बहुत प्रेमी होते हैं| कहीं
आनेजाने में विश्वास नहीं करते पर मोबाईल पर प्रकृति के सौन्दर्य को निहारने में
ये सदा आनंद लेते हैं| ये बरसात में भीगने की बजाय दूसरे कैसे भीग रहें हैं उसका
वीडियो लेकर सबको दिखाने की कला में ये निपुण होते हैं| प्राकृतिक अजूबों को देखकर,
दूसरों से चर्चा करने में ये बहुत आनंद
लेते है| घर की छत या आँगन में रखे गमलों में रखे पौधों में पानी
डालना तो दूर उसमें यदि कोई फूल खिला है उसे देखने का वक्त इनके पास नहीं होता|
इन मोबाईल ठलुओं का मोबाईल ही सब कुछ होता है|
ये उठते बैठते, सोते जागते हरदम इसे अपने पास रखते हैं| इनसे यदि इनका मोबाईल ले
लिया जाय तो ये वैसे ही परेशान होते हैं जैसे छोटे से बच्चे से उसकी चुसनी छीन ली
गयी हो| दिन या रात इनके शब्दकोष में होता ही नहीं| जब मन किया, हुडक आई, अपने
मोबाईल पर शुरू हो जाते हैं| ये एक मिनिट भी अपना जाया नहीं करते और इसीलिए इन्हें
अधिक से अधिक स्पीड वाला मोबाईल चाहिए| २जी है तो ३जी, ३जी है तो ४जी चाहिए ताकि
कम से कम समय में ज्यादा से ज्यादा वीडियो उतार सकें|
आजकल के एन्ड्रोइडफोन में इतनी सारी एपलीकेशंस
आ गई हैं कि ये उनका उपयोग सेल्फी बनने में करने लगे हैं| त्वचा पर मौजूद
दाग-धब्बे हटा कर फेयर एड लवली के विज्ञापन की तरह अपनी फोटो फेसबुक पर डाल देंगें
फिर इन्हें इंतजार होता है “लाईक” का! जितने “लाईक” इन्हें मिलते हैं उतने ही ये
खुश होते हैं| यदि किसी ने कह दिया आँख के नीचे कुछ कालापन दिख रहा है तो अगली
फोटो में उसे दूर करेंगे| फिर ये प्रक्रिया पूरे चेहरे को लेकर चलती जाती है कभी
आँखौ को गहरा व नशीला करेंगे| कभी होंठों को आकर्षक बनायेंगे| कुछ नहीं तो भौंह की
मोटाई, चौड़ाई से खेलेंगे| जो जैसी सलाह देगा उसी हिसाब से, ये उसे बदलते जायेंगे| सारे
काम ये लोग बहुत जल्दी-जल्दी करना चाहते हैं ताकि जल्दी से जल्दी चर्चा में आयें और
बहुत सारे लाईक्स उन्हें मिलें | सेल्फी खींचने की नई –नई जगह चुनते समय ये जांबाज़
बन जाते हैं| कभी मोबाईल गिराते हैं, कभी पास वाले व्यक्ति से टकराते हैं, लड़खड़ा
कर गिरने से बचते हैं| चलती बस या ट्रेन में रिस्क लेने से भी नहीं कतराते हैं| बस
इन्हें अपने “सेल्फी” होने की बात से मतलब होता है| अपने को खुश रखना व सबसे
ज्यादा चर्चित होना इनका उद्देश्य होता है| मोबाईल ठलुए की जय हो!
मनीषा
सक्सेना ,इलाहाबाद