Friday, 8 September 2017
Sunday, 27 August 2017
लघुकथा ----तमाशा
तमाशा
आज रात दशहरा मैदान में
प्रसिद्ध संगीत प्रतियोगिता का फायनल है |इसमें जगह बनाने के लिए पूरे देश के
दूरदराज़ से आये बच्चे भाग ले रहे हैं |इन्होने पिछले तीन साल से अपने गुरू के
घराने की डोर से बंधकर, संगीत की बारीकियों को सीखकर उसमें प्रवीणता पाई है |बचपन
का इनका अच्छा गाना गा लेने का शौक व माता पिता की बुलंदियों को छूने की इच्छायें,
अब इन्हें अपनी मंजिल तक पहुंचा रहीं हैं | नायक नायिकाओं का नखरा ,इठलाना ,अदाएं सब
अपने सुरों से ही दिखा देते हैं और उसमें पारंगत हो चुके हैं | माता पिता ,संगीत
के गुरूओं और अब देशवासियों का प्यार व आशीर्वाद उन्हें “सुरों की कोकिला” व “सुरों का बादशाह” बनाना चाहता है |
प्रचार- प्रसार ज़ोरों पे ----छोटे
से गाँव से लाया गया ,गुरूओं ने दिन-रात मेहनत करके प्रशिक्षित किया, माता पिता ने
कितने त्याग किये, कितने कष्ट सहे ,स्कूल छुड़वाना पडा ,घर से दूर छोड़ना पडा
-------प्रोग्राम की सफलता के लिए ईवेंट मेनेजर, ड्रेस डिज़ाईनर, विज्ञापनदाता अपनी
अपनी दूकान चलाकर अपना सर्वश्रेष्ठ दे रहे हैं |हरेक के मुंह से तारीफों की सरगम
निकल रही है |
डुगडुगी पिटी, अपने अपने गुरू की डोर
पकड़ के छोटे छोटे नौनिहालों को एक बड़े से झूले से स्टेज पर उतारा गया| सतरंगी
सपने, रंगबिरंगी झिलमिलाती बत्तियां,सपनीली दुनियां में विचरते बड़े लोग ----सुर ताल ,हाव –भाव एकदम प्रशिक्षित व सधे
हुए, कहीं कोई गलती नहीं| तालियों की गड़गड़ाहट के बीच बच्चों ने माइक रूपी कटोरे से
वोटों की भीख मांगी -------हर कोई गदगद| संचालक ने रूठने का नाटक किया, हंसीमजाक व
उछलकूद करके भीड़ को गुदगुदाया| सबको फायदा ------आर्थिक लाभ के साथ साथ लोकप्रियता
के सारे आंकड़े पार ------रिकॉर्ड तोड़ टी आर पी ---गुरू जी की वाह वाह ---- छोटी से
उम्र में प्रतिभा की पहचान----दाँव लगानें वालों की बल्ले बल्ले ----अगले कार्यक्रमों
का लाइसेंस ----माता पिता का उत्साह चरमोत्कर्ष पे---- छोटी सी उम्र में बच्चे
“स्वरों के सरताज” हो गये -----फ़क्र से
सीना चौड़ा हो गया |हर कोई खुश ---अपने को धन्य मानता हुआ |
मदारी रूपी माता पिता कभी ये समझ पायेंगे कि
उन्होंने अपने दमित सपनों को पूरा करने के लिए अपने ही आँखों के तारों का स्कूल व
बचपन छीन कर सरेआम उनका तमाशा बना दिया है साथ ही अपना भी|
मनीषा सक्सेना
इलाहाबाद
Friday, 25 August 2017
Monday, 21 August 2017
लघुकथा ---उलझन दाखिले की
उलझन दाखिले की
३ साल की बेटी के नर्सरी
क्लास के दाखिले के लिए जाने माने दो स्कूलों में एडमीशन टेस्ट दिलवाए थे | सोचा ढेरों बच्चों में पास भी होगी कि नहीं| नाम
पूछने पर कुछ बताया नहीं और कुछ सुनाया भी नहीं| एक चौकलेट दी गई | बिटिया ने खोल
कर वहीँ खा ली और हाथ में रेपर दिखाकर वहीँ बैठी नन से पूछा, आपकी डस्ट बिन कहाँ
है और बाहर चली गयी |आज जब रिज़ल्ट देखा तो दोनों स्कूल की लिस्ट में नाम था | किसमें
दाखिला लें---- इस पर हम माता पिता सहमत ही नहीं हो पा रहे थे |मां का दिल कहता
पास के स्कूल में डालें, आने जाने में कोई परेशानी नहीं, स्कूटी से हो जायेगा |कोई
बात हुई तो तुरंत जाकर देख सकते हैं |अभी आठवीं तक है तो क्या—हर साल क्लास बढाते
जा रहें हैं| आगे जाकर इंटर तक हो ही जाएगा|अभी ही इतने बच्चों में पास हो गई तो अनुमान
है आगे भी निकलती जायेगी| पिता का दिल कहता नामी गिरामी स्कूल में दाखिला हो गया
है तो उसी में मेरी बच्ची जायेगी |दूर है तो स्कूल बस से सवेरे जायेगी, इंटर तक का
प्रतिष्ठित स्कूल है ,लोग उसमें अपने बच्चों को पढ़ाने का सपना देखते है, महंगा है
तो क्या, एक ही बेटी है हमारी |घुड़सवारी ,तैरना ,खेलकूद, अच्छी टीचर| क्या नहीं है
वहां |
अच्छा हम लोग अपने दिल की बातें छोड़ कर
लाभ हानि के सारे बिन्दुओं को सान्झा कर लेते हैं जिसमें लाभ ज्यादा होगा उसमें
भेज देंगे -------
मां ---पास में है
,आना-जाना आसान ,टीचर पर बच्चों का बोझ कम याने ज्यादा अच्छी देखभाल, कम खर्चा, समय
की बचत, को-ऐड यानि सहसिक्षा का लाभ भी बेटी को मिलेगा|
पिता---स्कूल की पढ़ाई के
साथ हर क्षेत्र में बढ़ने के अवसर, इंटर तक के लिए निश्चिंती, समय व खर्च अधिक,
केवल लड़कियों का ही स्कूल होने से कोई लफडा व झंझट नहीं |
“देखिये सहशिक्षा बच्चों के
लिए अनिवार्य होनी ही चाहिए| बच्चों के स्वस्थ जीवन का ये अभिन्न अंग है| बाक़ी
अन्य बिन्दुओं को देखते हुए भी हम पास वाले स्कूल में दाखिला ले सकते हैं |”
“भई वाह, मान गए तुम्हारे
दिल और दिमाग के संतुलन को”
मनीषा सक्सेना
इलाहाबाद
लघुकथा ---संस्कृति
संस्कृति
संस्कृति उदास थी| उसकी कोई पूछ
नहीं थी| घर के कोने में पड़ी हुई थी| समय ने हाथ बढाया| आगे बढी, चल दी| सोचा,
खुली हवा में घूम आऊँ| समय ने कहा कुछ गाओ, संगीत उसके रग रग में बसा था| बड़े
आत्मविश्वास से मीरा का भजन सुनाना शुरू किया| समय ने प्यार से समझाया, संगीत ऐसा हो जो मन बहलाए,
बाज़ार में धूम मचा दे, कुछ आर्थिक फायदा भी कराये| संस्कृति समझ गई, अब वह समय के
साथ है व समय उसके साथ है |उसने गाने के साथ कमर मटकाई और यू पी, बिहार लूट ले गई|
बाज़ार में समय की तूती बोलने लगी| हर तरफ उसकी चर्चा थी पर संस्कृति मन ही मन दुखी
थी|
कविता लिखने बैठी |सूर ,तुलसी
प्रसाद उसकी आत्मा में बसे थे |समय ने विद्वत्ता झाड़ते हुए कहा क्या पुरानी सड़ी-
गली कविता कर रही हो| बोलचाल की भाषा में सुनाओ| व्यंग्य करो, कटाक्ष करो|
संस्कृति समय की बात समझ गई |मोहल्ले के कवि सम्मेलन जैसी द्विअर्थों
वाली कविता कहने लगी | दिल ही दिल में रोने लगी| उसे लगा वह समय की गिरफ्त में आ
गयी है |
रंग व तूलिका मन में रचे बसे थे| समय को
समझते हुए उसने अल्पना व रंगोली छोड़ , उलझाव वाले डिजाइन बनाए| श्लोक लिखा, बीच
में ईश्वर का प्रतीक बनाया| समय ने घुर्राते हुए खारिज कर दिया| समय की आहट सुनाई
दे, डिजाइन ऐसा होना चाहिए| संस्कृति ने गुस्से में ट्यूब से रंग बिखरा दिए, टाट
के पैबंद लगाए| अव्यवस्था व अराजकता के प्रतीक वाले चित्र को प्रतियोगिता में
प्रथम स्थान प्राप्त हुआ| समय खुशी से नाचने लगा| संस्कृति हैरान, चकित थी| उसे यह
समझ में आ गया कि समय उसी के बल पर इठलाता है और उसे ही आंख दिखाता है| विजेता
संस्कृति को कुछ बोलने के लिए कहा गया| अपनी मातृभाषा में उसने बोलना चाहा| समय ने
फिर उसे घुड़का – अम्मां का पल्लू पकड़ कर कब तक रोती रहोगी, गवांर थी और गंवार ही
रहोगी| गर्म हवा का थपेड़ा उसके मुंह पर लगा| अब उससे सहा नहीं गया| बस अब और नहीं
|
समय को पीछे छोड़ संस्कृति आगे निकल आई|
उसे समझ में आ गया था अपने को ज़िंदा रखना है तो उसे किसी की दया की ज़रूरत नहीं है,
बस अपनी अस्मिता को बनाए रखना है| समय खुद ब खुद उसके पास आयेगा|
मनीषा सक्सेना
इलाहाबाद लघुकथा ------रोटी प्रेमी
रोटी प्रेमी
अस्सी वर्षीय सिन्हाजी के
दांत एक एक करके निकाले गए फिर नाप लेके बत्तीसी बनने को गई आज वह बन कर आनें को
है| वे बहुत उत्साहित थे की दांत बन जायेंगे तो रोटी खा पायेंगे |दांत बनने की प्रक्रिया
के दौरान वे, रोटी ही नहीं खा पा रहे थे|
“सुनिये जी, डॉक्टर ने
कितने बजे बुलाया है?”
“दोपहर एक बजे| ये लल्लू
पता नहीं अभी तक नहीं आया”
“आजायेगा| कहीं फंस गया
होगा |”
“अच्छा सुनों गैस आ गयी ?”
पोपले मुंह से सिन्हा जी ने पत्नी से पूछा|
“कहाँ आई |ग्यारह से बिजली
भी गायब है |लगता है ट्रांसफार्मर जल गया है| गनीमत थी कि सूप व दलिया सुबह ही
हीटर पर बना लिया था |”
“बस मेरे दांत बनकर आने दो,
मैं तुमको छोडूंगा नहीं| सब तरह की रोटी बनवा कर खाउंगा|”
“तुम और तुम्हारा रोटी
प्रेम---- गैस तो आने दो, जो कहोगे बना दूँगी|”
“एक बात तो तुमको माननी
पड़ेगी कि चूल्हे की सिंकी रोटी में जो स्वाद आता था वो गैस में कहाँ |”
“अजी गैस छोडिये, अब तो
रोटी बनाने की मशीन आ गई है| लोई डालो और रोटी उतार लो| स्कूल के बच्चों के मिड डे
मील के लिए, वृन्दावन में, दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर में भी मशीन लगी है| हज़ारों
को रोटी मिलती है |”
“मशीन में वो बात कहाँ| जब
प्यार से बनी एक-एक, गरम गरम नाचती हुई रोटी, सीधी थाली में आती थी|”पेट भर जाए पर
मन ना भरे |
“हाँ,सो तो है| बनाने में
भी मज़ा आता था----- मक्का, ज्वार, बाजरा और मिस्सी की रोटियाँ|”
“रोटी की सहेलियां, मक्खन
की डली, चटनी और प्याज |क्या स्वार्गिक आनन्द|”
“जाड़े में खिला दूंगी |”
“न न न--- जाड़ों में तो
रोटी का भैया ---- पराठे ही बनाना |मूली, आलू .गोभी, सत्तू की पराठे, दही के साथ
मज़ा ही आ आता है |”
“और रोटी की साली --- खस्ता
कचौड़ी के बारे में आपका क्या ख़याल है ?”
“अरे ----याद मत दिलाओ,
दालभरी बेढ्मी कचौड़ी तो अभी भी ६,७ खा सकता हूँ |”
“टाइम क्या हुआ है? डॉक्टर
के पास एक बजे पहूँचना है लल्लू भी नहीं आया |”
“बारह बज चुके हैं| मैं और
इंतज़ार नहीं करूंगा, चलो रिक्शे से पंद्रह मिनिट में पहुँच जायेंगे|”अस्पताल का
पता बता कर वे रिक्शे पर बैठे|
“सुनों लल्लू बता रहा था,
कर्नलगंज में दो तीन परिवार के लोग, शाम से रोटी सेंकते हैं| खूब बिक्री होती है
|सस्ती भी है, दस रूपये की पांच |”
“चलो, अच्छा है कॉलेज में
पढने वाले बच्चों को आराम हो गया| सब्जी या आमलेट बनाया और रोटी खरीद ली|”
“मेरा मन नहीं करेगा रोटी
बनाने का, तो मैं भी मंगा लिया करूंगी|”
“देखो रोटियाँ चुगलखोर होती
हैं| किसने बनाई हैं, बता देती हैं|”
डॉक्टर से दांत लेकर लगाते
हुए बोले अब तो बस मुझे रोटी ही खानी है |हाँ सब खा लेंगे डा.ने आश्वस्त किया
|रिक्शा पकड़ कर घर आ रहे थे तो पत्नी के कहने पर कर्नलगंज से ६ रोटियां बंधवा ली
|अचानक मोटरसायकिल वाला सामने आया रिक्शे वाले ने तेज़ी से ब्रेक लगाए तो झटका लगा
,दोनों बुज़ुर्ग दंपत्ति आगे की ओर फिसल गए| रोटी हाथ में थी और बत्तीसी मुंह से
निकल कर सड़क पर चूर चूर हो गयी |
मुस्कुराते हुए बोले “देखो जी
मैंने रोटी नहीं छोड़ी |”पत्नी ने हाथ पकड लिया और दोनों की आँखे भर आईं|
मनीषा सक्सेना
इलाहाबाद
लघुकथा अनकहा
अनकहा
बेटे बहु ने बड़े इसरार करके
माता- पिता को अपने मेट्रो शहर में बुलाया |घर में हर प्रकार की सुविघाएँ थीं| फोन
पर ही सब राशन-पानी, सब्जी– भाजी घर बैठे ही मिल जाती है |कभी हरी सब्जी लाने का
मन किया भी तो बेटा ही कहने लगता आज तो लगता है आप पूरी मंडी ही उठा लायें हैं
|नवां महीना लगने पर मांजी बहू को आराम करने को कहती तो वह टोकाटाकी में शामिल
होता| बहु हंसकर कहती आपका पोता आयेगा ना तो वह आपको चैन से बैठने नहीं देगा और
मांजी पोते का सपना देखा करतीं |
समय पर पोता ही हुआ, मानों सपना साकार हुआ, मांजी
ने सारा काम अपने पर ले लिया |राततक थक के चूर हो जाती पर पोते में मगन रहती, मां
के पास तो बच्चा सिर्फ दूध पीने जाता| सारे समय बाबा-दादी और उनका खिलौना-- प्यारा
सा पोता|देखते ही देखते सालभर होने को आया, बेटे बहु की टोकाटाकी बढ़ने लगी –बच्चे
को अपनेआप खाने दीजीये ,ज्यादा गुद्दकड़ ना बनाइये ,अपनेआप खेलने दीजीये, चलते समय
गिर जाए तो अपनेआप उठने दीजीये आदि आदि| शूशू –पौटी के लिए भी बच्चे को डांट पड़ती
तो दोनों का कलेजा मुंह को आ जाता |
शाम को बेटा बहू बहुत खुश खुश घर आये, आते ही
बोले -------
“मां मंदिर में प्रसाद
चढ़ाइए, आपके पोते का एडमिशन शहर के नामीगिरामी डे-स्कूल में हो गया है |अब हम लोग
शांति से अपने काम पर लौट सकेंगे|”
“इतना छोटा बच्चा ------और
------स्कूल -----|” दादी का मुंह खुला रह गया |
“मांजी आप बिलकुल चिंता मत
कीजीये ५ बच्चों पर एक आया है, साथ के बच्चों के साथ खेलने से उसे अच्छी कंपनी भी
रहेगी |”
“पूरे पांच साल की छुट्टी
हो गई |पांच साल का होने पर अपना काम अपने आप करने लगेगा|”
“इतना छोटा ----कैसे ------दिन भर तुम लोगों को चिंता लगी रहेगी|”
“मां-------लड़की थोड़ी ना है
जो दिनभर चौकीदारी करनी है, पोता है पोता--- तुम्हारा|” “तुम भी चिंता करना छोड़ दो
|”
“बेचारा अभी से स्कूल के
चक्रव्यूह में फंस जाएगा |”
“नहीं मां, शनिवार इतवार की
छुट्टी के साथ और भी अगल-बगल छुट्टी होगी
ही, आप लोगों के बिना तो रह ही नहीं सकते, खून तो आपका ही है ना ----------|”
बाबा ने मोबाइल पर वापसी का
टिकिट कटवा लिया|
मनीषा सक्सेना
इलाहाबाद
लघुकथा असुरक्षा
असुरक्षा
रात में होने वाली पार्टी के लिए सोच रही थी कि क्या पहनूं---नई सिलवाई ड्रेस
या ईवनिंग गाउन जैसा कुछ कि पतिदेव की कड़कती हुई आवाज़ कान में पड़ी “सुनो, आज ज़रा
ढंग से तैयार होना, कुछ भी पहन लेती हो |”
“हाँ बाबा हाँ ,हर बार ढंग से ही तैयार होती हूँ, तुम्हें तो खुश होना चाहिए
कि तुम्हारी बीबी पर प्लाजो से लेकर साड़ी तक, हर तरह की ड्रेस अच्छी लगती है|”
“किसी को उलटा सीधा बोलने का मौक़ा ही नहीं मिलना चाहिए|”
“दूसरे का मुंह थोड़े ही पकड़ सकते हैं जो जैसा होता है उसके मुंह से वैसे ही
बोल निकलते हैं |”सब तुम्हारी तरह थोड़े ही न हैं अच्छा लगेगा तब भी मुंह से बोल न
फूटें|”
“बोल तभी निकलते हैं जब --------बुदबुदा कर रह गए| भंगिमा ऐसी कि कच्चा ही चबा
जायेंगे|”
“भगवान् का ही दिया रंगरूप है--- मैं क्या कर सकती हूँ? ऐसी हूँ----- तो हूँ|”
“मेरी बीबी को कोई कुछ भी बोले ये मैं सहन नहीं करूंगा| दूसरों से मुझे क्या करना
है वह उसकी अपनी सोच है|”
“यही तो मैं भी कह रही हूँ ,तुम बेवजह परेशान हो रहे हो|”
“पिछली बार देखा नहीं था तुम्हारी उस ड्रेस पर------ मेरे सहकर्मी कैसी तुम्हारी
प्रशंसा कर रहे थे ,कोई ड्रेस की तारीफ़ करता ,तो कोई उम्र को मात देने की बात करता
,चेहरा मेरी तरफ और नज़र भाभीजी पे| दो किशोरों की मां हो--- कॉलेज की ब्यूटी क्वीन
नहीं |”
“चलो खुश हो जाओ, ४५ साल की उम्र में भी तुम्हारी बीबी इतनी कमसिन दिखती है, तभी
तो सब तुमसे जलते हैं |पत्नी का ख़याल रखने की टिप्स भी, तुम्हीं से तो पूछते हैं |”सच
पूछो तो मुझे तो दिल ही दिल में अच्छा ही लग रहा था, अपनी तारीफ़ सुनके|”
“ऐसे लोगों को तो मैं एक निगाह में ही पहचान जाता हूँ|” “तारीफ़ करने का भी एक
ढंग होता है|”
“तुम भी ना ------ज्यादा ही भावुक हो रहे हो|” साल्ट एंड पेपर बालों का ढीला
सा जूडा बनाते हुए बोली |
“मेरी तारीफ़ क्यों होती है उसे तुम नहीं समझोगी| मक्खन मारने के बहाने हैं सब”
“किसी के कहने से हम वैसे ही थोड़े न हो जायेंगे, जैसे होंगें वैसे ही तो
रहेंगे| अगला तारीफ़ के बोल ही बोल रहा है न ----- |” आसमानी शिफौन की साड़ी पे मोती
की माला पहन कर तैयार हो गयी |“हाँ तुम्हारी ये बात सही है, किसी को बेमतलब बातें
बनाने का मौक़ा ही नहीं देना चाहिए|”
“अब चलें--------मेरे मिस्टर अम्बानी”
चलते चलते एक सरसरी सी निगाह डालते हुए आगे बढ़कर कार का दरवाज़ा खोल दिया| पत्नी
की ड्रेस को लेकर हुई असुरक्षा का शमन जो हो चुका था|
मनीषा सक्सेना
इलाहाबाद
Saturday, 12 August 2017
हाइकू शब्द
हाइकू शब्द
१
खो देते अर्थ
भारी भारी से शब्द
सरल कहें
२
शब्द सरल
भले, सुने न जाएँ
रखें महत्व
३
शब्द ही शब्द
ढूँढ़ते हैं भीड़ में
अपने अर्थ
४
कड़वे शब्द
चाशनी डूबे हुए
पचाते लोग
५
शब्दों की मार
घाव करे गंभीर
ता उम्र रहे
६
शब्द चुनाव
सादे, सोचे-समझे
डालें प्रभाव
७
शब्द मीठे से
कानों में मिश्री घोलें
काम निकालें
८
ढाढस देते
फेरे सिर पे हाथ
मौन हैं शब्द
९
हैं बिके हुए
हाँ में हाँ करें शब्द
जाल बिछाएं
१०
मोती से शब्द
आँखों से ढुलकते
हाल ए दिल
११
सीटी से शब्द
सुहावना मौसम
हाल ए बयाँ
१२
चांदनी रात
निशब्द हम दोनों
बातें करते
१३
शब्दों से ज़ियादा
शब्दहीन उपेक्षा
सालती टीस
१४
मिले न शब्द
प्राकृतिक वैभव
निहारें सब
१५
शब्दों का खेल
बनाए या बिगाड़े
दिलों का मेल
१६
शब्दों का जाल
घुमाव आकर्षक
बुरा हो हाल
मनीषा सक्सेना
इलाहाबाद
Saturday, 5 August 2017
लघुकथा ------दोहरा सुख
दोहरा सुख
“सरकारी नौकरी में रखा क्या
है”
“क्यों बहुत परेशान लग रहे
हो| इस नौकरी ने तुम्हें क्या नहीं दिया है? अच्छी तन्खवाह ,सरकारी घर, काम करने
के तय घंटे, और क्या चाहिये |”
“बंधीबंधाई तनखा से गुजारा
कहाँ ?”
“और जो बंगले की ज़मीन, हर
मौसम की सब्जी ,फल ----ताज़े का मज़ा ही और है|”
“अपने पोती पोतियों को
इन्हीं साग-भाजी की फोटो दिखाना और तो कुछ कमाई तो की नहीं जीवन में|”
“दादा जी आम तोड़ दीजीये ना,
मेरा हाथ नहीं पहुँच रहा है|”
“पेड़ पर चढ़ कर तोड़ो|”
“आप चढाओ न|”
“देखो भाई, इससे बड़ी और
क्या बात हो सकती है कि मेरे लगाए कलमी आम के पौधे फल देने लगे हैं और मेरे पोते
अपने हाथ से तोड़ कर खा रहे हैं|”
“घर और पेड़ तो सरकारी है|
इसका क्या मोह? अपने घर में लगाते तो बात है |”
“ठीक है, ४ साल बाद रिटायर
हो जाऊंगा| जो इस घर में आयेगा वो इसका सुख उठायेगा, दुआएं तो मुझे ही मिलेंगी|
मैंने तो अपने बच्चों को सिखाया है, अच्छी यादें दी हैं| अब पोते को पेड़ पर चढाकर
अपना बचपन जी रहा हूँ| आम, केला, जामुन, शहतूत ,करौंदा ,पपीता और हर मौसमी फल को
बड़े होते देख रहा है | पोते को प्रत्यक्ष दिखा कर पौधों के प्रति उसकी
सम्वेदनशीलता विकसित कर रहा हूँ| ये क्या कम उपलब्धि है|”
“ये सब तो दिल बहलाने की
बातें हैं| दोस्त, इतना होता ही कहाँ है कि एक बार की सब्जी बन जाए ---“
“ना सही, आलू ज़मीन के ऊपर
होता है कि नीचे, जानकारी तो है| आँखों देखी बातें बच्चा नहीं भूलता|” यही है
सरकारी नौकरी के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष फायदे |बच्चे संस्कारी, जानकार व अनुभवी
बने यही सच्चा सुख है, इसी के कारण मैं भी सुखी हूँ, हुआ ना दोहरा सुख|”
मनीषा सक्सेना
लघुकथा ----अपनी अपनी पूजा
अपनी अपनी पूजा
सीमा सुबह से काम पे काम
निबटाती जा रही थी बाई भी दो दिन जन्माष्टमी की छुट्टी लेकर गयी है |रोज़मर्रा के
काम के साथ भोग का सामान और व्रत का खाना अलग -----कमर टूटने लगी |बच्चे भी अब कुछ
काम नहीं करवा पाते ,छोटे थे तो भगवानजी की झांकी ही सजा लेते थे| अब वो काम भी
मेरे ही माथे |घर का कोई काम हो ----मम्मी तो हैं ही----- कर ही लेंगी|यही रव्वैया
मुझे पसंद नहीं आता |घर के काम को तो कोई हाथ ही नहीं लगाना चाहेगा |सब अपने अपने
कमरे में धूनी रमाये हैं|
“अरे उठिए भी साढे ग्यारह
हो गए हैं”
“हाँ उठ रहा हूँ, बस १० मिनिट
आयकर का रिटर्न पूरा कर दूं”
“मांजी टीवी बंद कर दूं भोग
लगाने का समय हो गया है|”
“हाँ ,,,चलो मथुरा के
प्रोग्राम बड़े अच्छे दिखाते हैं|”
“बेटा चलो भोग का समय हो
गया”
“दो मिनट मम्मी------ आप
लोग शुरू करो, मैं बस पहुँच ही रहा हूँ|”
घूमफिरकर, पूजा के कमरे में
आकर दिया जलाया ,अगरबत्ती जलाई |आवाज़ तेज़ करके पुकारा तो सब मुंह बनाते हुए ऐसे
आये मानो पूजा करते से सबको उठा दिया हो|
“अरे भाई, पान का पत्ता
नहीं रखा, जल किससे चढाऊँ?”
“गंगासागर लीजीये ना |”
“पान की बेल रोज़ सींचता ही
इसलिये हूँ कि कृष्णजी के चरणों में उसके पत्ते से जल अर्पित कर सकूँ| मैं अभी
लेकर आता हूँ |”
सुनकर ही सीमा के तनबदन मैं
आग लग गयी| “कितना भी याद रखो एक न एक कमी ज़रूर निकालेंगे |दो दिन से लगी हूँ तब
किसी को याद नहीं आया एन वक्त पर सब काम करने चलते हैं|”
“मम्मी आप लोगों की लड़ाई
शुरू -----पूजा जल्दी से करिए ताकी पेट पूजा हो सके |”
मोबाइलपर आरती बजने लगी
-------आरती जुगल किशोर की कीजै ,तन- मन- धन न्योछावर कीजे |सब यंत्रवत बिना कुछ
बोले आरती की ताल पे ताली बजाने लगे|
मनीषा सक्सेना
इलाहाबाद
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