Monday, 21 August 2017

लघुकथा ------रोटी प्रेमी

रोटी प्रेमी  
अस्सी वर्षीय सिन्हाजी के दांत एक एक करके निकाले गए फिर नाप लेके बत्तीसी बनने को गई आज वह बन कर आनें को है| वे बहुत उत्साहित थे की दांत बन जायेंगे तो रोटी खा पायेंगे |दांत बनने की प्रक्रिया के दौरान वे, रोटी ही नहीं खा पा रहे थे|
“सुनिये जी, डॉक्टर ने कितने बजे बुलाया है?”
“दोपहर एक बजे| ये लल्लू पता नहीं अभी तक नहीं आया”
“आजायेगा| कहीं फंस गया होगा |”
“अच्छा सुनों गैस आ गयी ?” पोपले मुंह से सिन्हा जी ने पत्नी से पूछा|
“कहाँ आई |ग्यारह से बिजली भी गायब है |लगता है ट्रांसफार्मर जल गया है| गनीमत थी कि सूप व दलिया सुबह ही हीटर पर बना लिया था |”
“बस मेरे दांत बनकर आने दो, मैं तुमको छोडूंगा नहीं| सब तरह की रोटी बनवा कर खाउंगा|”
“तुम और तुम्हारा रोटी प्रेम---- गैस तो आने दो, जो कहोगे बना दूँगी|”
“एक बात तो तुमको माननी पड़ेगी कि चूल्हे की सिंकी रोटी में जो स्वाद आता था वो गैस में कहाँ |”
“अजी गैस छोडिये, अब तो रोटी बनाने की मशीन आ गई है| लोई डालो और रोटी उतार लो| स्कूल के बच्चों के मिड डे मील के लिए, वृन्दावन में, दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर में भी मशीन लगी है| हज़ारों को रोटी मिलती है |”
“मशीन में वो बात कहाँ| जब प्यार से बनी एक-एक, गरम गरम नाचती हुई रोटी, सीधी थाली में आती थी|”पेट भर जाए पर मन ना भरे |
“हाँ,सो तो है| बनाने में भी मज़ा आता था----- मक्का, ज्वार, बाजरा और मिस्सी की रोटियाँ|” 
“रोटी की सहेलियां, मक्खन की डली, चटनी और प्याज |क्या स्वार्गिक आनन्द|”
“जाड़े में खिला दूंगी |”
“न न न--- जाड़ों में तो रोटी का भैया ---- पराठे ही बनाना |मूली, आलू .गोभी, सत्तू की पराठे, दही के साथ मज़ा ही आ आता है |”
“और रोटी की साली --- खस्ता कचौड़ी के बारे में आपका क्या ख़याल है ?”
“अरे ----याद मत दिलाओ, दालभरी बेढ्मी कचौड़ी तो अभी भी ६,७ खा सकता हूँ |”
“टाइम क्या हुआ है? डॉक्टर के पास एक बजे पहूँचना है लल्लू भी नहीं आया |”
“बारह बज चुके हैं| मैं और इंतज़ार नहीं करूंगा, चलो रिक्शे से पंद्रह मिनिट में पहुँच जायेंगे|”अस्पताल का पता बता कर वे रिक्शे पर बैठे|  
“सुनों लल्लू बता रहा था, कर्नलगंज में दो तीन परिवार के लोग, शाम से रोटी सेंकते हैं| खूब बिक्री होती है |सस्ती भी है, दस रूपये की पांच |”
“चलो, अच्छा है कॉलेज में पढने वाले बच्चों को आराम हो गया| सब्जी या आमलेट बनाया और रोटी खरीद ली|”
“मेरा मन नहीं करेगा रोटी बनाने का, तो मैं भी मंगा लिया करूंगी|”
“देखो रोटियाँ चुगलखोर होती हैं| किसने बनाई हैं, बता देती हैं|”
डॉक्टर से दांत लेकर लगाते हुए बोले अब तो बस मुझे रोटी ही खानी है |हाँ सब खा लेंगे डा.ने आश्वस्त किया |रिक्शा पकड़ कर घर आ रहे थे तो पत्नी के कहने पर कर्नलगंज से ६ रोटियां बंधवा ली |अचानक मोटरसायकिल वाला सामने आया रिक्शे वाले ने तेज़ी से ब्रेक लगाए तो झटका लगा ,दोनों बुज़ुर्ग दंपत्ति आगे की ओर फिसल गए| रोटी हाथ में थी और बत्तीसी मुंह से निकल कर सड़क पर चूर चूर हो गयी |
मुस्कुराते हुए बोले “देखो जी मैंने रोटी नहीं छोड़ी |”पत्नी ने हाथ पकड लिया और दोनों की आँखे भर आईं|
मनीषा सक्सेना
इलाहाबाद
      


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