रोटी प्रेमी
अस्सी वर्षीय सिन्हाजी के
दांत एक एक करके निकाले गए फिर नाप लेके बत्तीसी बनने को गई आज वह बन कर आनें को
है| वे बहुत उत्साहित थे की दांत बन जायेंगे तो रोटी खा पायेंगे |दांत बनने की प्रक्रिया
के दौरान वे, रोटी ही नहीं खा पा रहे थे|
“सुनिये जी, डॉक्टर ने
कितने बजे बुलाया है?”
“दोपहर एक बजे| ये लल्लू
पता नहीं अभी तक नहीं आया”
“आजायेगा| कहीं फंस गया
होगा |”
“अच्छा सुनों गैस आ गयी ?”
पोपले मुंह से सिन्हा जी ने पत्नी से पूछा|
“कहाँ आई |ग्यारह से बिजली
भी गायब है |लगता है ट्रांसफार्मर जल गया है| गनीमत थी कि सूप व दलिया सुबह ही
हीटर पर बना लिया था |”
“बस मेरे दांत बनकर आने दो,
मैं तुमको छोडूंगा नहीं| सब तरह की रोटी बनवा कर खाउंगा|”
“तुम और तुम्हारा रोटी
प्रेम---- गैस तो आने दो, जो कहोगे बना दूँगी|”
“एक बात तो तुमको माननी
पड़ेगी कि चूल्हे की सिंकी रोटी में जो स्वाद आता था वो गैस में कहाँ |”
“अजी गैस छोडिये, अब तो
रोटी बनाने की मशीन आ गई है| लोई डालो और रोटी उतार लो| स्कूल के बच्चों के मिड डे
मील के लिए, वृन्दावन में, दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर में भी मशीन लगी है| हज़ारों
को रोटी मिलती है |”
“मशीन में वो बात कहाँ| जब
प्यार से बनी एक-एक, गरम गरम नाचती हुई रोटी, सीधी थाली में आती थी|”पेट भर जाए पर
मन ना भरे |
“हाँ,सो तो है| बनाने में
भी मज़ा आता था----- मक्का, ज्वार, बाजरा और मिस्सी की रोटियाँ|”
“रोटी की सहेलियां, मक्खन
की डली, चटनी और प्याज |क्या स्वार्गिक आनन्द|”
“जाड़े में खिला दूंगी |”
“न न न--- जाड़ों में तो
रोटी का भैया ---- पराठे ही बनाना |मूली, आलू .गोभी, सत्तू की पराठे, दही के साथ
मज़ा ही आ आता है |”
“और रोटी की साली --- खस्ता
कचौड़ी के बारे में आपका क्या ख़याल है ?”
“अरे ----याद मत दिलाओ,
दालभरी बेढ्मी कचौड़ी तो अभी भी ६,७ खा सकता हूँ |”
“टाइम क्या हुआ है? डॉक्टर
के पास एक बजे पहूँचना है लल्लू भी नहीं आया |”
“बारह बज चुके हैं| मैं और
इंतज़ार नहीं करूंगा, चलो रिक्शे से पंद्रह मिनिट में पहुँच जायेंगे|”अस्पताल का
पता बता कर वे रिक्शे पर बैठे|
“सुनों लल्लू बता रहा था,
कर्नलगंज में दो तीन परिवार के लोग, शाम से रोटी सेंकते हैं| खूब बिक्री होती है
|सस्ती भी है, दस रूपये की पांच |”
“चलो, अच्छा है कॉलेज में
पढने वाले बच्चों को आराम हो गया| सब्जी या आमलेट बनाया और रोटी खरीद ली|”
“मेरा मन नहीं करेगा रोटी
बनाने का, तो मैं भी मंगा लिया करूंगी|”
“देखो रोटियाँ चुगलखोर होती
हैं| किसने बनाई हैं, बता देती हैं|”
डॉक्टर से दांत लेकर लगाते
हुए बोले अब तो बस मुझे रोटी ही खानी है |हाँ सब खा लेंगे डा.ने आश्वस्त किया
|रिक्शा पकड़ कर घर आ रहे थे तो पत्नी के कहने पर कर्नलगंज से ६ रोटियां बंधवा ली
|अचानक मोटरसायकिल वाला सामने आया रिक्शे वाले ने तेज़ी से ब्रेक लगाए तो झटका लगा
,दोनों बुज़ुर्ग दंपत्ति आगे की ओर फिसल गए| रोटी हाथ में थी और बत्तीसी मुंह से
निकल कर सड़क पर चूर चूर हो गयी |
मुस्कुराते हुए बोले “देखो जी
मैंने रोटी नहीं छोड़ी |”पत्नी ने हाथ पकड लिया और दोनों की आँखे भर आईं|
मनीषा सक्सेना
इलाहाबाद
No comments:
Post a Comment