Saturday, 5 August 2017

लघुकथा ----अपनी अपनी पूजा

अपनी अपनी पूजा
सीमा सुबह से काम पे काम निबटाती जा रही थी बाई भी दो दिन जन्माष्टमी की छुट्टी लेकर गयी है |रोज़मर्रा के काम के साथ भोग का सामान और व्रत का खाना अलग -----कमर टूटने लगी |बच्चे भी अब कुछ काम नहीं करवा पाते ,छोटे थे तो भगवानजी की झांकी ही सजा लेते थे| अब वो काम भी मेरे ही माथे |घर का कोई काम हो ----मम्मी तो हैं ही----- कर ही लेंगी|यही रव्वैया मुझे पसंद नहीं आता |घर के काम को तो कोई हाथ ही नहीं लगाना चाहेगा |सब अपने अपने कमरे में धूनी रमाये हैं|
“अरे उठिए भी साढे ग्यारह हो गए हैं”
“हाँ उठ रहा हूँ, बस १० मिनिट आयकर का रिटर्न पूरा कर दूं”
“मांजी टीवी बंद कर दूं भोग लगाने का समय हो गया है|”
“हाँ ,,,चलो मथुरा के प्रोग्राम बड़े अच्छे दिखाते हैं|”
“बेटा चलो भोग का समय हो गया”
“दो मिनट मम्मी------ आप लोग शुरू करो, मैं बस पहुँच ही रहा हूँ|”
घूमफिरकर, पूजा के कमरे में आकर दिया जलाया ,अगरबत्ती जलाई |आवाज़ तेज़ करके पुकारा तो सब मुंह बनाते हुए ऐसे आये मानो पूजा करते से सबको उठा दिया हो|
“अरे भाई, पान का पत्ता नहीं रखा, जल किससे चढाऊँ?”
“गंगासागर लीजीये ना |”
“पान की बेल रोज़ सींचता ही इसलिये हूँ कि कृष्णजी के चरणों में उसके पत्ते से जल अर्पित कर सकूँ| मैं अभी लेकर आता हूँ |”
सुनकर ही सीमा के तनबदन मैं आग लग गयी| “कितना भी याद रखो एक न एक कमी ज़रूर निकालेंगे |दो दिन से लगी हूँ तब किसी को याद नहीं आया एन वक्त पर सब काम करने चलते हैं|”
“मम्मी आप लोगों की लड़ाई शुरू -----पूजा जल्दी से करिए ताकी पेट पूजा हो सके |”
मोबाइलपर आरती बजने लगी -------आरती जुगल किशोर की कीजै ,तन- मन- धन न्योछावर कीजे |सब यंत्रवत बिना कुछ बोले आरती की ताल पे ताली बजाने लगे|
मनीषा सक्सेना
इलाहाबाद  

    

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