Sunday, 27 August 2017

लघुकथा ----तमाशा


तमाशा
               आज रात दशहरा मैदान में प्रसिद्ध संगीत प्रतियोगिता का फायनल है |इसमें जगह बनाने के लिए पूरे देश के दूरदराज़ से आये बच्चे भाग ले रहे हैं |इन्होने पिछले तीन साल से अपने गुरू के घराने की डोर से बंधकर, संगीत की बारीकियों को सीखकर उसमें प्रवीणता पाई है |बचपन का इनका अच्छा गाना गा लेने का शौक व माता पिता की बुलंदियों को छूने की इच्छायें, अब इन्हें अपनी मंजिल तक पहुंचा रहीं हैं | नायक नायिकाओं का नखरा ,इठलाना ,अदाएं सब अपने सुरों से ही दिखा देते हैं और उसमें पारंगत हो चुके हैं | माता पिता ,संगीत के गुरूओं और अब देशवासियों का प्यार व आशीर्वाद उन्हें  “सुरों की कोकिला” व “सुरों का बादशाह”  बनाना चाहता है |
               प्रचार- प्रसार ज़ोरों पे ----छोटे से गाँव से लाया गया ,गुरूओं ने दिन-रात मेहनत करके प्रशिक्षित किया, माता पिता ने कितने त्याग किये, कितने कष्ट सहे ,स्कूल छुड़वाना पडा ,घर से दूर छोड़ना पडा -------प्रोग्राम की सफलता के लिए ईवेंट मेनेजर, ड्रेस डिज़ाईनर, विज्ञापनदाता अपनी अपनी दूकान चलाकर अपना सर्वश्रेष्ठ दे रहे हैं |हरेक के मुंह से तारीफों की सरगम निकल रही है |
           डुगडुगी पिटी, अपने अपने गुरू की डोर पकड़ के छोटे छोटे नौनिहालों को एक बड़े से झूले से स्टेज पर उतारा गया| सतरंगी सपने, रंगबिरंगी झिलमिलाती बत्तियां,सपनीली दुनियां में विचरते बड़े लोग  ----सुर ताल ,हाव –भाव एकदम प्रशिक्षित व सधे हुए, कहीं कोई गलती नहीं| तालियों की गड़गड़ाहट के बीच बच्चों ने माइक रूपी कटोरे से वोटों की भीख मांगी -------हर कोई गदगद| संचालक ने रूठने का नाटक किया, हंसीमजाक व उछलकूद करके भीड़ को गुदगुदाया| सबको फायदा ------आर्थिक लाभ के साथ साथ लोकप्रियता के सारे आंकड़े पार ------रिकॉर्ड तोड़ टी आर पी ---गुरू जी की वाह वाह ---- छोटी से उम्र में प्रतिभा की पहचान----दाँव लगानें वालों की बल्ले बल्ले ----अगले कार्यक्रमों का लाइसेंस ----माता पिता का उत्साह चरमोत्कर्ष पे---- छोटी सी उम्र में बच्चे “स्वरों  के सरताज” हो गये -----फ़क्र से सीना चौड़ा हो गया |हर कोई खुश ---अपने को धन्य मानता हुआ |
          मदारी रूपी माता पिता कभी ये समझ पायेंगे कि उन्होंने अपने दमित सपनों को पूरा करने के लिए अपने ही आँखों के तारों का स्कूल व बचपन छीन कर सरेआम उनका तमाशा बना दिया है साथ ही अपना भी|
मनीषा सक्सेना
इलाहाबाद   

                

No comments:

Post a Comment