Wednesday, 23 October 2019
Thursday, 3 October 2019
लघुकथा 32 मैं और मेरा समय
लघुकथा ३२ मैं और
मेरा समय
समय सीमा
मैं और मेरा समय
अक्सर बातें करते हैं कि तुम मेरे पास होते तो मैं ये करती, मैं वो करती और आज हालात ये हैं कि सुबह
से शाम कुछ ऐसा करते बीत जाती है जो कतई आवश्यक नहीं है|
“मुझे याद है समय जब
तुम बातों की साझेदारी से हम सबको एक सूत्र में बांधे रहते थे जो आज भी मुझे गुदगुदाती
हैं|”
“हाँ तब आपसी रिश्ते
तो लम्बे समय तक या ये कहूँ कि जीवन भर साथ निभाते थे|”
“आज तुमने मुझे अपनी
ही सीमाओं से ऐसा बाहर निकाला है कि मैं डाल डाल तो तुम पात पात, मुझसे आगे ही रहते
हो|”
“मैंने तो तुम्हें
आगे बढ़ने की प्रेरणा ही दी है|”
“प्रेरणा के साथ ही तुम
मुझे थमाते जाते हो नए नए उपकरणों का पुलिंदा| जिसमें मैं इस कदर उलझ कर रह जाती
हूँ कि अपनों की बात तो दूर, खुद अपने लिए ही मुझे फुर्सत नहीं है| मजबूरी या
स्वार्थवश किसी से मदद की गुहार लगाऊँ तो वो भी पलट कर कहता है, समय नहीं है| सांस
लेने की फुर्सत तो हैं नहीं, काम क्या करें ख़ाक|”
“ये तो तुम्हारा
अपना सोचना है”
“मेरे साथ की सब
सीमाएं भी आगे बढ़ने की होड़ में दौड़ती जा रहीं हैं| आज फलां चीज़ का समय है तो मैं
उसके आगे वाले समय पर येन केन प्रकारेण कब्जा कर लूं|” “
“इस आगे बढ़ने की दौड़
में कोई मंजिल नहीं है| तुम्हें कोई ठिकाना नज़र आ रहा है?”
“मैं तो ये सोच भी
नहीं पा रही हूँ कि आखिर इसकी ज़रूरत हमें है भी या नहीं? है तो
क्यों? यदि नहीं है तो हम इसके पीछे भाग क्यों रहे हैं? हांफते हांफते नकारात्मकता
भी मन में भर रही है कि क्या हम बस इसीलिए भाग रहे हैं कि दूसरों से पीछे ना रह
जाएँ|”
“इसी सोच के कारण
तुम मुझे ही पछाड़ने में लग गयी हो| यह भी
भूल गयी हो कि तुम मुझे पछाड़ नहीं सकती, तुम तो क्या नियति भी मुझे पछाड़
नहीं सकती|” समय ने धीरे पर दृढ़ स्वर में कहा|
“समय, मेरी भी कुछ
सीमाएं हैं इन सीमाओं से मैं बाहर नहीं जा
सकती|”
“मैं तुम्हें अवसर
देता हूँ, फुरसती पल देने की कोशिश करता हूँ, जिंदगी में ठहराव लाने की कोशिश करता
हूँ|”
“अच्छा समय, अब एक
काम करो, तुम संकेत दो ताकि हम तुम्हारे सिद्धांत को समझें तभी मेरे स्व का
अद्भुदय होगा तभी हम दोनों साथ साथ सुकून की सांस ले सकेंगे|”
“रहने दो, अभी तो बस
तुम अपनी व्यस्तताओं का बहाना मार कर, मजबूरी व स्वार्थवश मुझसे ही होड़ लगाकर
मुझको ही छल रही हो और इसीलिए तुम मेरे पीछे आने को मजबूर हो|”
“समय कहते हैं कि,
तुम बड़े से बड़ा घाव भर देते हो| तुमने तो नए नए सपने दिखाकर और नई नई चीजें थमाकर
ऐसा घाव दिया है जिससे हम अपने घाव और बढ़ा लेते हैं और सच में अब तो तुम्हीं से
होड़ लगाने लगे हैं|”
“इतनी ठोकरें खाने
के बाद अब यह तो समझ में आ गया होगा कि तुमको
फिर से अपनी सीमाओं में बंध जाना चाहिए पर..... सोचने और करने में बहुत फर्क है|”
“समय, तुम्हारी सीमा
तो अनंत है पर यदि मैं तुम्हें समय सीमा में बाँध लूं तो मैं सुकून पा सकती हूँ|
यही मेरा सकारात्मक पक्ष है| अतः अब मैनें
यह दृढ़ निश्चय कर लिया है कि मैं तुम्हें समय सीमा में बांधूंगी, इससे मेरी
ज़िन्दगी भी सवंरेगी और हमारी भी|”
तब से आज तक समय
सीमा के साथ ख़ुशी ख़ुशी बंधा हुआ है|
मनीषा सक्सेना
प्रयागराज
Friday, 27 September 2019
Wednesday, 25 September 2019
लघुकथा 31 पापा जब बच्चे थे
लघुकथा ३१ पापा जब बच्चे थे
पापा जब बच्चे थे
पापा जब बच्चे थे
मीठी को रोज़ एक कहानी दादी से सुनने की आदत है|
“दादी आज एकदम नयी कहानी सुनाओ|”
“कौनसी…… राजा रानी, अकबर
बीरबल, गांधीजी, सरदार पटेल, .....”
“नहीं ये सब तो मुझे बाबाजी
ने सुना दी हैं| आप एकदम नयी वाली सुनाओ ना|”
“अच्छा तो मैं तुम्हें
सूर्पनखा व लक्ष्मण की कहानी सुनाती हूँ|”
“नहीं, ये भी मुझे आती है|”
“तो फिर जातक कहानियाँ…. एनीमल्स वाली .....”
“ये भी मुझे मालूम हैं..... बन्दर, मगरमच्छ, बिल्लियों, शेर चूहे,
रंगा सियार वाली सब मुझे याद हैं दादी|”
“तो फिर कौनसी सुनाऊं?”
“अच्छा कोई बात नहीं याद नहीं
है तो, मैं मम्मी से मोबाइल लेकर आती हूँ आप गूगल खोलकर यु ट्यूब में से सुना दो|”
“अरे रुको रुको ......मैं तुम्हारे पापा छोटे थे तो क्या शैतानी करते
थे उसकी कहानी सुनाऊं?”
“पापा शैतान बच्चे थे” मीठी
ने चौंककर पूछा|
“हाँ ,,,,बचपन में सब बच्चे
नटखट होते हैं|”
“हाँ ....हाँ ......दादी प्लीज़ सुनाओ ना....”
“तुम्हारे पापा लगभग तुम्हारे जितने या शायद उससे भी शायद छोटे रहे
होंगे|”
“मैं अभी ९ साल की हूँ तो
पापा.....”
“हम्म ......शायद ६ साल के ...”
“ओ के|”
“हम लोगों ने शिमला घूमने का
प्रोग्राम बनाया| एक सूटकेस और एक बैग में सामान भरकर तांगे में रखा| पानी की बोतल व टिफ़िन का डिब्बा
पापा ने अपने पास ही रखा| रेलवे स्टेशन पर आये और प्लेटफॉर्म पर गाडी आने का इंतज़ार
करने लगे|”
“दादी ये बताइये आप लोग तांगे
से स्टेशन क्यों आये, आप लोगों को ओला टेक्सी नहीं मिली क्या?”
“बेटा उस ज़माने में तांगे ही
चलते थे| ऑटो भी थे पर इक्का दुक्का| खैर हम सब ट्रेन आने का इंतज़ार करने लगे| तुम्हारे
पापा प्लेटफॉर्म पर घूम रहे थे|”
“अरे दादी आपके पास नहीं बैठे| कोई पकड़ के ले जाता तो?”
“उस ज़माने में प्लेटफार्म पर इतनी भीड़ नहीं होती थी न.... और फिर हम
लोग तो उनको देख ही रहे थे | अचानक पापा दौड़ते हुए आये और अपना टिफिन कस के पकड़ कर
ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगे कि मां मां सारा सामान भागा जा रहा है|”
“आयं ,.....ये कैसे? सामान
थोड़े ही भागता है दादी|”
“सोचो और बताओ ऐसे क्यों
बोला?”
“पता नहीं .....हारी .. आप
बताओ .”
“तुम्हारे पापा ने बिलकुल ठीक कहा था| ऐसा होता है जब दूसरी बगल वाली
पटरी पर ट्रेन चलती है तो हमें भ्रम होता है कि हम चलने लगे हैं तो वही भ्रम उनको
भी हुआ|”
“ऐसे कैसे दादी......”
“अबकी बार ट्रेन में बैठो तो
ध्यान देना----जब तुम्हारी ट्रेन खड़ी हो और बगल वाली ट्रेन चलने लगे तो तुम्हें
ऐसा लगेगा कि तुम्हारी ट्रेन चलने लगी है|”
“ये तो बहुत मजेदार बात है
दादी|”
“उससे भी मज़ेदार बात तो ये है कि पापा को जब प्लेटफार्म चलने का भ्रम
हुआ तो पेटूराम ने दौड़कर सबसे पहले अपना टिफिन पकड़ा|”
“ओ फ़ो ....दादी, बाक़ी सामान
बड़े थे ना........ तो फिर कैसे पकड़ते?”
“हाँ..... ये बात तो है मेरी
दादी अम्मा ......
मनीषा सक्सेना
प्रयागराज
Monday, 23 September 2019
लघुकथा २८ गिनती का महत्व
छोटी सी बात
घर में
अलमारियों के बनने का काम चल रहा है छुट्टियों में बेटा भी अपने परिवार सहित आया
हुआ है|बढई ने सामान मंगवाने के लिए बुलाया मैंने ईशान पोते से कहा पेपर पर सामान
की लिस्ट बना लो|पोते को देख बढई भी जोश में आकर सांमान लिखवाने लगा----- तीन गुणा
आठ फुटी छःजोड़ी लकड़ीके फट्टे,दो शीट सनमाइका,चार इंची के दो
दर्जन स्क्रू,आधा इंची की दो सौ कीली| वह कुछ समझा--- कुछ नहीं ------रुआंसा सा
बोला “दादी, बढई काका हिन्दी में नाप बोल रहे हैं मुझे हिंदी में समझ नहीं आता|”
बढई ने उतने ही ठसके से कहा “हमको भी अंग्रेजी नहीं आती|भईया जी को कहें वही आकर
लिस्ट बनावें|” पास ही खड़ी महरी बोली “हाय दईया, इसानभैया को हिंदी में लिखना नहीं
आता|” “आता है पर हिंदी की गिनती नहीं आती, स्कूल में सारा गणित अंग्रेजी में होता
है|”
बेटा बहू दोनों शर्मिन्दा थे क्योंकि मेरे बार बार कहने के बावजूद भी उन्होंने
ईशान को हिंदी की गिनती सिखाने की कभी कोशिश ही नहीं की| उनका तर्क था “मम्मी,जब
हमें ही हिंदी की गिनती का काम नहीं पडा तो हमारे बच्चे तो फिर अगली पीढी के हैं |महानगर
में तो सारा सामान माँल से आता है और छोटा मोटा बिल्डिंग की दूकान से,पेमेंट भी
पेटीएम या कार्ड से हो जाता है|”“ठीक है, अपनी मातृभाषा में तो गिनती तो हर बच्चे
को आनी ही चाहिये| कितने ही बड़े इंजीनियर बन जाओ काम करते वक्त तो तुम्हारा वास्ता
कामगारों से ही पडेगा और उनकी भाषा तो समझ में आनी ज़रूरी है| तुम लोगों की इस सोच
के कारण बेटा बढई की हंसी का पात्र बन गया|”
“सौरी बेटा, मैंने तुम्हें हिंदी की गिनती नहीं सिखाई”|
“कोई बात नहीं डैड, मैं दादी से सीख लूँगा और बढई काका के साथ रोज़
प्रेक्टिस भी कर लूंगा|
आँखों में आंसू देख कर बोला “डैड बड़े बड़े शहरों में छोटी छोटी बाते
होती ही रहती हैं ---------कह कर गले से लग गया|
मनीषा सक्सेना
प्रयागराज २११००२
लघुकथा २७ सर्वश्रेष्ठ कौन
सर्वश्रेष्ठ कौन
समय के चार पहर की
सहेलियां एक दूसरे को जानती नहीं पर एक दूजे के वजूद से वाकिफ़ हैं| सूर्योदय होते
ही आती है ऊषा| जोश ताजगी से भरी,दिन की शुरूवात करती, लालिमा लिए हुए, कुछ करने
का माद्दा रखते हुई, आशा का संचार करने वाली|दोपहरिया –तप कर सोना बनाने
वाली,अनेकानेक प्रयोग करके अपने को सार्थक करके, संतुष्टि प्राप्त करने के लिए
बावली सी,अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करने से भी नहीं चूकतीहै|इसके बाद आती है मदमस्त
संध्या,सान्ध्यदीप जला कर निशा को बुलाती हुई, छोटी ही सही पर खुशियाँ देती
हुई|अंत में आती है निशा, सबको अपने आगोश में लेने को आतुर| कितना ही कोई थका हारा
क्यों न हो सबको अपने में समा लेती है, अमन चैन कायम रखती है|
यहाँ तक तो ठीक था
कि सब बारी बारी से आती और अपना महत्वपूर्ण काम करके चली जाती पर आपस में झगडा तो
तब शुरू हुआ जब दोपहरिया ने उषा निशा की सीमाओं में घुसना शुरू कर दिया| तर्क दिया
कि “जीवन में कर्म का पाठ मैं पढ़ाती हूँ,मैं न होऊं तो सबकुछ टूट कर बिखर जाएगा|”“मैं
ही तो टूटे बिखरे को अपने में समेटती हूँ, जान डालती हूँ” निशा ने अपना महत्व
बताया|“ठीक है ,माना तुम जान डालती हो पर आशा का सन्देश देकर फिर से प्रेरित तो
मैं ही करती हूँ” ताजगी से भरी उषा बोली| “कुछ भी कहो मैं संध्या आज भी सबकी चाहत
हूँ, चहेती भी हूँ ,भले ही दोपहर ने मुझे अपने में समावेशित कर लिया है इसी कारण
दोपहर ने अपना नाम खो दिया है और सुकून से भरे दो पल की संध्या, सबका सपना है| अतः
मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ, यकीन न हो तो मानव से पूछ लो -------सर्वश्रेष्ठ कौन?”
मनीषा सक्सेना
प्रयागराज २११००२
लघुकथा ३० ----अनावश्यक भार
अनावश्यक भार
रूपेश व मिताली की मन मांगी मुराद दो साल बाद आज पूरी हो गयी| डॉक्टर
ने मिताली की गर्भवती होने की पुष्टि कर दी| साथ ही अनेक सावधानियों के साथ, खाने
में क्या क्या खाना है उसकी लिस्ट भी चार्ट बना कर समझाई| फौलिक एसिड, विटामिन, आयरन
की गोलियों के साथ साथ खाने में दूध, अंडा रोज़ लें| मांसाहारी हैंतो लाल मांस की
बजाय चिकिन,मछली को प्राथमिकता देने को कहा है| अंकुरित अनाज, हरा साग, सलाद,
मौसमी फल लेने को कहा ताकि कब्ज़ ना हो|
मिताली को चिंतित देखकर रूपेश ने छेड़ा “अभी से तुम्हारा ध्यान हमारे
बच्चे की ओर लग गया है मेरा भी तो कुछ ख़याल करो|”
“नहीं ये बात नहीं है,मांजी को
पता चलेगा की अंडा रोज़ खाना है,मछली भी रोज़ खा सकते हैं तो वो तो बिखर जायेंगी| आज
तक उन्होंने सोमवार, मंगल, गुरूवार, शनिवार को अंडा बनाना तो दूर खाने तक नहीं
दिया है|”
”तुम बेकार में अपने मन में बोझ न रखो, सबको समझाया जाएगा|” घर पर
मांजी ने खुशखबरी सुनी तो वो फूली नहीं समाई|अच्छा मां एक बात बताइये की आपको एक
बाल्टी पानी में आपको बालकनी में रखे तीसों गमलों में पानी देना हैतो आप क्या
करेंगी?”
“थोड़ा थोड़ा सबमें दूँगी या जिसमें ज्यादा ज़रूरत होगी उसमें ज्यादा
दूंगी|”
“यदि कहा जाए कि एक दिन छोड़ कर पानी दें तो ......”
“पौधे को पूरीखुराक नहीं मिलेगी और वे अच्छी तरह नहीं पनपेंगे”|
“मां डॉक्टर ने कहा है कि आपके नाती की अच्छी
बढ़वार के लिए मां का विटामिन व आयरन लेना ज़रूरी है इसलिए अंडा भी रोज़ लेना चाहिए|”
“हाँ क्यों नहीं,बस मंगल और शनिचर को हनुमान जी के दिन होते हैं उस
दिन न लो|”
“मां जी अभी पितर चल रहें हैं अभी कैसे खायेंगे?”
“मां ये तुम्हारी बहू है न.... समझाओ इसे... रोज़ सारी चीज़े थोड़ी थोड़ी
खाना है.... नहीं तो तुम्हारा फूल जैसा नाती मुरझाने लगेगा....बिना बात में दिल पर
बोझ लिए घूम रही है अभी ये नहीं खाना है आजसोमवार है, इस दिन शनिवार है वगैरह
वगैरह”|
“न न बेटा बच्चों के मामले में सारे दिन बराबर होते हैं ऊँच नीच कुछ
नहीं होता है”
“मांजी आप तो शुरू से ही ये तीज त्यौहार मनाती आई हैं और सब कुछ मानती
भी हैं”
“हाँ बहू तुम्हें सब इसलिए बताती और कराती आई क्योंकि तुम पढ़ाई पूर्ण
करके सीधे ही शादी के बाद मेरे पास आ गयी| यहाँ नाते रिश्तेदारों के बीच तुम्हें
रहना है अतः तीज त्यौहार पर खानपान कैसा हो ये सब तुम्हें पता होना चाहिए ताकि समाज
में उसके अनुकूल व्यवहार कर सको .....अच्छा
ये सब छोड़ो .....बताओ बहू क्या खाना है, वही बना देती हूँ”
“नहीं मां डॉक्टर साहब ने इसे हाथ पे हाथ धर कर बैठने को थोड़े ही कहा
है| जितना हो सके उतना ही करना है, चलते फिरते रहना है|” “जाओ भई चिकिन सूप सबके
लिए बना लाओ|हमें भी तो ताक़त लानी है|”
मिताली के मन से एक अनावश्यक बोझ उतर गया उसने कृतज्ञतापूर्ण दृष्टि
रूपेश पर डाली और मुस्कुराकर सूप बनाने चल दी|
मनीषा सक्सेना
प्रयागराज
Wednesday, 18 September 2019
लघुकथा 29 हिंदी का मायका
हिंदी का मायका
पिछले एक हफ्ते से हिंदी
बहुत उदास है|चौदह सितम्बर से उसके स्वागत में कार्यक्रम किये जा रहे है| उसे ऐसा
लग रहा है जैसे मन से किसी को भी अब उसकी परवाह नहीं है और इसी लिए सब जगह भारी
भड़कम कार्यक्रम करके, दिखावा किया जा रहां है| हाँ हाँ तुम अब भी हमारी हो.........
देखो हम सब तुम्हें कितना याद किया करते है| दिया जला कर मां सरस्वती का आव्हान
किया जा रहा है| आगुन्तकों का फूलमालाओं से स्वागत कर श्रीफल और शौल देकरउनसे
हिंदी बोलने- लिखने की प्रार्थना की जा रही हैं..... पर आखिर क्यों?मैं कोई सास
हूँ जो इतना दिखावा हो रहा है| भारत मेरा मायका है.....सबके अवचेतन मन में रची बसी
हुई हूँ मैं तो ......|हारी बीमारी, सुख-दुःख, शुभकामनाएं, शुभाशीष देते समय सब
मुझे ही याद करते आये हैं| फिर अब.....ये सब क्यों? दिया जलाना, आरती गाना...... फूलमाला पहनाना|प्रसाद का लड्डू
मुंह में ठूँसकर सब लोग यूं ही हाथ पे हाथ धरे क्यों बैठे हैं|
मैं तो स्वतंत्रता से कलकल
बहने वाली नदी हूँ जिसमें सारी चचेरी, मौसेरी, ममेरी, फुफेरी बहिनेसाथ साथ रहती
हैं| अपनी इन्हीं भोजपुरी, अवधि, ब्रज, उर्दू, जैसी बहिनों के कारण ही मैं इतनी मीठी
व सशक्त बन पाई हूँ| तुम्हारी मुंहबोली बहिन अंग्रेजी का भी आदर करती हूँ पर मैं ये
भी देख रही हूँ कि तुम लोग उसका सम्मान मुझसे ज्यादा करते हो....... तो बताओ, मुझे
बुरा नहीं लगेगा ...सगी बहिन को भूल कर मुंहबोली बहिन को ज्यादा तवज्जो........ ये
कौनसा नियम है? और तो और अपने बच्चों को भी मुझसे मिलवाने से हिचकते हो ....बोलो
जवाब दो|
याद करो वो ज़माना जब स्वत्रंत्रता सग्राम
में वीरांगना सी मैं लड़ी थी| आज पूरे देश में हर राज्य के लोग मुझे गले लगाते हैं|विदेशों
में भी मैं अपनी लालिमा बिखेरती हूँ| मेरा शब्दकोष भी बहुत गहरा है क्योंकि मैं
देश की ही नहीं विदेशी बहनों को भी समुचित आदर के साथ, अपने में शामिल करती हूँ
परअपने ही घर में एक दिनी या सप्ताहिकी दिखावटी आदर प्रदान किया जाना...... मुझे
बिलकुल नहीं सुहा रहा है| खुश तो मैं तब होउंगी जब तुम सब अपने दैनिक क्रियाकलाप
के साथ तकनीक में भी मुझे शामिल करोगे| मेरा विश्वास है कि ये काम भी ज़रूर होगा|
तुम करो या न करो पर आने वाली पीढ़ी ज़रूर करेगी| जब विदेशी तुमसे मेरे बारे में
पूछेंगे तो तुम उनको क्या कहोगे........ अपनी नज़रों में तो गिरोगे ही तुम्हारे
अपने बच्चे भी तुमको इसके लिए कभी माफ़ नहीं करेंगे| अब भी समय है, चेत जाओ
......मेरा तो मायका है...... इसको दुनिया की कोई ताकत झुठला नहीं सकती तुम भी
नहीं .......
मनीषा सक्सेना
जी १७ बेल्वेडीयर प्रेस
कम्पाउंड
प्रयागराज २११००२
Tuesday, 10 September 2019
ठहराव
ठहराव
ट्रेन द्रुत गति से
भागी जा रही है और मेरा मन उससे दुगने वेग से दौड़ रहा है|पतिदेव स्टेशन पर उतरे
थे,अभी तक डिब्बे में नहीं आये|पता नहीं चढ़ पाए कि नहीं... आधा घंटा होने को
आया|शौचालय में तो इतनी देर नहीं लगाते हैं| इनका फोन भी यहीं चार्जिंग में लगा
है|लाख बार मना किया है अब उम्र का तो ख्याल करा करो, सिर्फ पांच मिनिट का ठहराव
है, मत उतरो ....पर नहीं ... “अभी बस पैर सीधे करके आता हूँ| चढ़ जाऊँगा, फिकर मत
करो|” करूँ तो क्या करूँ ....
पिछले दो बार से ऐसे ही हो रहा है
...जनाब स्टेशन पर ट्रेन रूकते ही, उतर जाते हैं| पहली बार भोपाल जाते वक्त उतरे
थे ... दो मिनिट बाद ही ट्रेन चल दी,मैं दौड़कर दरवाज़े तक गयी|कहीं दिखे नहीं| फोन
मिलाया तो घंटी जाती रही ...अगले स्टेशन पर ट्रेन रूकी तो हाथों में समोसे लेकर
चले आये, चिढ़कर मैंने शिकायत की कि फोन क्यों नहीं उठा रहे थे? झुंझुलाकर बोले
“स्लीपर के डिब्बे में सुनाई देता है क्या? फोन नहीं मिलरहा है, तो मैसेज करना था,वो
तो मैं हमेशा पढता हूँ|”
दूसरी बार पूना जाते
वक्त उतरे थे तब मैं सो रही थी वो भी ऊपर की बर्थ पर ...सहयात्री ने उठाया “भाभी
जी, भाईसाहब कटनी स्टेशन से दिख नहीं रहे हैं काफी देर हो गयी है|” मैंने घबरा कर
फोन टटोला तो याद आया, सोने से पहले इनको पकड़ाया था| परेशान होकर सहयात्री से मदद
मांगी तो इनका नंबर ही याद न आये| जनवरी के महीने में पसीने से तरबतर -----जैसे
तैसे अपने फोन का नंबर याद आया, मिलाया तो..... “हाँ हाँ चढ़ गया हूँ, एसी टू टियर
से दरवाज़ा बंद है इसलिए पहुँच नहीं पा रहा हूँ” आवाज़ सुनकर जान में जान आई थी|
अब हैदराबाद जाते
समय फिर वही... इस बार तो कुछ करना ही होगा.... आने दो छोडूंगी नहीं.....अपनी उम्र
देखते नहीं, बस उतरने का शौक है| ट्रेन में चढ़ते वक्त हड़बड़ी में पैर फिसल जाए,
धक्का लग जाए,कुछ समझने को तैयार नहीं...बस उतरना ज़रूरी है| मन ही मन बडबड करती
हुई....दोनों फोन हाथ में थामें... हर केबिन में झांकते हुए... शौचालय की तरफ बढ़ी|
टी टी भी कहीं दिख नहीं रहा है| एसी डब्बे का दरवाज़ा खोला तो महाशय अटेन्डेन्ट की
सीट पर किसी से बातें कर रहे थे| गुस्से में मुंह से बस इतना निकला “हद करते हैं
आप” और तुरंत मुड़कर वापिस अपनी सीट पर जा बैठी| दस मिनट बाद आकर बोले “इतना क्यों
डरती हो डिब्बे में ही तो बैठा हूँ”| “हद कर दी है आपने मुझे पता है क्या ...कहाँ
खोजूं जाकर ...फोन रखा है नहीं| ट्रेन चले आघे घंटे से ऊपर हो गया ...शौचालय की
बत्ती हरी है ...टी टी भी नहीं है ...और एक आप हैं कि गप्प मार रहे हैं|” “इतने
सालों बाद परिचित साथी मिला तो बात करने लग गया”|
“इस समय वो शख्स मुझसे ज्यादा महत्वपूर्ण है?” “तुम तो बेकार की बातें करती
हो” “ठीक है, यही हरकत जो आपने की है, वही यदि मैंने की होती, तो आप क्या करते
बताइये? अब अगले स्टेशन पर...... मैं ...नीचे.... उतरूंगी|” मेरा समूचा शरीर काँप
रहा था और इनके होंठ .... |
एक घंटे बादविजयवाड़ा
पर ट्रेन रूकी| इन्होंने मेरे हाथ पर अपना हाथ रखा और हम मुस्कुरा दिए| मैंने
इन्हें फोन पकड़ाया--------“दस मिनिट ठहरेगी, इसी डिब्बे में ना चढ़
पायें तो कोई बात नहीं----- फोन कर दीजियेगा”| ये फिर पैर सीधे करने चल दिए
.......
मनीषा सक्सेना
जी १७ बेल्वेडीयर
प्रेस कम्पाउंड
प्रयागराज २११००२
Monday, 9 September 2019
समय का बद्लाव और हिंदी
समय का बदलाव और हिंदी
हर साल हिंदी दिवस, हिन्दी सप्ताह, हिन्दी पखवाड़ा
सितम्बर के महीने में मनाया जाता है| ओजस्वी भाषणों, कविता वाचनों,
और
विभिन्न हिंदी साहित्य के पुरुस्कार समारोह के आयोजनों में जो धनराशि खर्च की जाती
है उसका काम ऐसा ही है जैसे बच्चे का जन्मदिन मनाना| जितना बड़ा प्रतिष्ठान उतना ही भव्य
आयोजन|
राष्ट्रभाषा ज़रूरी क्यों --------
मनुष्य अपने विचारों की अभिव्यक्ति किसी न किसी भाषा के माध्यम से करता है| भाषा से ही सामाजिक परिवेश बनता है,
सांस्कृतिक
उत्थान होता है और तभी राष्ट्र की प्रगति होती है| साहित्य, कला, विज्ञान,
इतिहास,
संगीत
सबका आधार भाषा ही है|
सितम्बर १९५० में गांधीजी की उस पीढी ने हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दे
दिया था| वह पीढी यह
सोचती थी कि कोई भी मुल्क भाषा के अभाव में स्वाधीन नहीं बना रह सकता है| भाषा की अहमियत समझाने की कोशिश रूस ने
की थी| भारतीय राजनायिक
ने अपना कार्यभार ग्रहणपत्र अंग्रेजी में दिया था तो वहां की सरकार ने लेने से मना
कर दिया और कहा कि अंग्रेजी गुलाम भारत की भाषा थी और अंग्रेजी में पत्र प्रस्तुत
करना गुलामी का प्रतीक है, गुलाम देश के साथ अंतर्राष्ट्रीय
सम्बन्ध स्थापित करने का कोई औचित्य नहीं बनता है|
भाषा का संस्कृति से गहरा सम्बन्ध है, संस्कृति शरीर
है तो भाषा उसका प्राणतत्व| १९६८ में राजभाषा संकल्प के अंतर्गत
त्रिभाषा फॉर्मूला बनाया गया -१ हिन्दी २.अंग्रेजी ३.कोई भी भारतीय भाषा| स्पष्ट था कि उत्तरवासी, दक्षिण
की कोई भाषा पढ़े तथा दक्षिणवासी उत्तर की|
ऐसा हो ना सका| राजभाषा नियमों व उपनियमों के
चक्रव्यूह में फंस कर रह गयी|
साठ व सत्तर के दशक में नारे तो बहुत आये –“अंग्रेजी में
काम ना होगा फिर से देश गुलाम न होगा”, “अँगरेज़ यहाँ से चले गए अंग्रेजी हमें
हटानी है” पर कुछ नौकरशाही व कुछ राजनीतिज्ञों की दृढ इच्छाशक्ति के अभाव में
ये नारे खाली नारे ही रह गए| रही
सही कसर नब्बे के दशक से शुरू हुई उदारीकरण की आर्थिक नीति ने कर दी| जिससे
बहुराष्ट्रीय निगमों का प्रवेश होने लगा और अंग्रेजी के थोड़े बहुत उखड़ते पाँव और
जमने लगे|
यहीं से हिंदी का अनादर करना शुरू हुआ| हिंदी को
हिंगलिश में परिवर्तित करने की कोशिश की जाने लगी| पूरे देश में
अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की बाढ़ आ गयी|
इन स्कूलों के पाठ्यक्रमों में हिंदी (जो हमारी मातृभाषा है) का प्रवेश दूसरी कक्षा से प्रारम्भ किया जाने
लगा| यह सर्वमान्य मत है कि बच्चों को प्रारम्भिक शिक्षा मातृभाषाओं में
ही दी जानी चाहिए| हम मध्यम वर्ग वाले भी कहने लगे कि हिंदी तो
हमारी मातृभाषा है जो देर सवेर आ ही जायेगी| अंग्रेजी जरूर
आनी चाहिए क्योंकि वह कार्यक्षेत्र की भाषा है| आज आवश्यकता इस
बात की है कि प्रारम्भिक कक्षाओं में पहले हिंदी का अक्षर ज्ञान कराया जाए और बाद
में अंग्रेजी का| अंग्रेजी तो वो सीखेगा ही, हिंदी
सिखानी ज़रूरी है| हिंदी ना आने का मतलब है बच्चा भारतीय समाज व
संस्कृति से अलग हो गया| आजकल के अधिकाँश बच्चे हिंदी की गिनती
नहीं जानते क्योंकि यह अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाई नहीं जाती| यदि
उनसे अड़सठ रूपए देने को कहा जाए तो वे मुंह बाए देखते रहेंगे| दुकानवाला
हिंदी में मोबाइल नंबर बोले तो वे उनकी समझ से बाहर होता है|
इस दौर में पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन, उद्योग व्यापार
की तरह शुद्ध लाभ हानि की कसौटी पर होने लगा| न्यूज़ चैनल अपनी
रेटिंग और अखबार अपने विज्ञापन बढाने को प्राथमिकता देने लगे|
हिन्दी के अखबारों में हिन्दी के मूल शब्दों को हटा कर अंग्रेजी के शब्द
छापे जाने लगे---- जैसे माता पिता की जगह पेरेंट्स, रविवार की बजाय
सन्डे, यातायात की बजाय ट्रेफिक यानी कि हिन्दी के शब्दों को धीरे धीरे
बोलचाल की भाषा से उखाड़ने का काम| उदाहरण के लिए “इलाहाबाद
यूनिवर्सिटी में वेस्टर्न डांस की क्लासेस शुरू”| इस तरह से कोशिश
ये रही हुई कि धीरे धीरे इन अंग्रेजी शब्दों को इतना बढ़ा दिया जाए की मूल भाषा
हिंदी कारक भर रह जाए| इसी तरह आप एफ़एम. रेडियो पर ‘रेडियो
मिर्ची’ सुनिए तो समझ में ही नहीं आता है कि ये कौनसी भाषा है| उदाहरण
के लिए---“मॉर्निंग आवर्स के हेवी ट्रेफिक को देखते हुए, डिस्ट्रिक्ट
एडमिनिसट्रेशन ने बहुत ही जनुऐन एफर्ट्स किये हैं पर इससे यूनिवर्सिटी रोड पर भीड़
बढती जा रही है, आप आनंद भवन के सामने से लेफ्ट टर्न मारो और
फ़टाफ़ट पहुँचो|” ऐसे ही हिंदी कॉमेंट्री में अंग्रेजी के
वाक्यांश सुने तो जाते ही हैं और अब अखबारों में भी लिखे जाने लगे हैं| जैसे----नो
डाउट, आउट ऑफ रीच इत्यादि| इस तरह की भाषा पांच दस साल सुनी और
पढी जायेगी तो आजकल का युवा भ्रमित हो जाएगा और बच्चे एक वाक्य भी हिंदी में बोल
नहीं पायेंगे| समझ के अभाव में आम जनता भी भाषा परिवर्तन की
इस प्रक्रिया को ऐतिहासिक प्रक्रिया मानने लगी है| इस प्रकार हिंदी
की बजाय हिंगलिश को बढ़ावा मिला|
इसके कारण क्या हैं ?
हम भारतीय अभी भी अंग्रेजी की मानसिक गुलामी से ग्रसित हैं| अंग्रेजी
वस्तुएं श्रेष्ठ हैं, अंग्रेजी नाम फैशनेबल हैं यही मानते हैं|
भारतीय
उद्धोगपत्तियो ने अपने संस्थानों के नाम अंग्रेजी में रखे हैं जैसे रिलाइन्स,
पीटर
इंग्लेंड, मोंटी कार्लो, एलेन सौली|बिजली की कम्पनी हवेलीराम ने हेवल्स नाम
रखा| मसालों के नाम--- महाशय दी हट्टी की बजाय एम डी एच रखना ज्यादा पसंद
किया है| यही नहीं कृषि में उर्वरकों के नाम व उनकी प्रयोग करने की विधि भी
अक्सर अंग्रेजी में लिखी जाती है| माना जाता है कि साइनबोर्ड अंग्रेजी
में होंगे तो बिक्री अच्छी होगी|
कोर्ट कचहरी में ६० ७० साल पहले उर्दू में दस्तावेज तैयार होते थे और अंग्रेजी में फैसले लिखे जाते थे|
आश्चर्य
की बात है कि आज भी केवल मध्यप्रदेश को छोड़कर सभी राज्यों में फैसले अंग्रेजी में
ही लिखे जाते हैं यहाँ तक कि हिंदी भाषी राज्य उत्तरप्रदेश में भी| उ.प्र.में
प्रेमशंकर गुप्त ही ऐसे जज थे जिन्होंने हिंदी में फैसले सुनाए थे|
मातृभाषा के मोह ने हिंदी की व्यापकता पर चोट की| दक्षिण की
भाषाओं ने हिंदी को नुकसान तो पहुंचाया ही, उत्तर की
क्षेत्रीय भाषाओं के प्रति भी मोह पनपने लगा| आज जिसे हम
हिंदी कहते हैं वह विभिन्न बोलियों के समावेश से ही बनी है| भोजपुरी,
मैथिली,
अवधि,
बृज,
मगही,
अंगिका,
जैसी
बोलियों की साहित्यिक परंपरा व मिठास से ही खड़ीबोली बनी है| यही खड़ीबोली
मानकीत होकर आज एक समृद्ध भाषा हिंदी के रूप में प्रतिष्ठित है| अतः
उत्तर के हर क्षेत्र की बोली हिन्दी से क्यों अलग हो जाए? सूरदास,तुलसीदास,
कबीर के बिना, हिंदी साहित्य की कल्पना आप कर सकते हैं? खड़ीबोली में फ्रेंच,
पुर्तगाली, अरबी, फ़ारसी, संस्कृत, अंग्रेजी के शब्द भी आसानी से समावेशित होने के
कारण, हिंदी विश्व की उन्नत भाषाओं के बीच खड़ी है|
अंग्रेजी के पक्षधर कहते हैं कि ज्ञान-विज्ञान
की किताबों का हिन्दी में रूपान्तरण नहीं हो सकता| यह ठीक नहीं है|
इसके
साथ ही सरकारी प्रयासों से जो अनुवाद पुस्तकें सामने आईं उनमें विदेशी लेखकों की
भरमार थी| हमारी मौलिकता तो विलुप्त हुई ही साथ ही राष्ट्रीय विचारधारा के लेखक
जैसे जयशंकर प्रसाद, दिनकर, मैथिलीशरण गुप्त भी हाशिये पर आ गए |
अब हिंदी का रुतबा बढ़ा है ----------
२०१० तक जब तक यूनीकोड कम्पूटर पर नहीं आई थी,
हिन्दी
की वर्तिनी हिंदी सुषा, सुषमा आदि अलग अलग थीं अतः हम इस क्षेत्र में
आगे नहीं बढ़ पा रहे थे| यूनीकोड के आने के बाद हिंदी के प्रचार प्रसार
में व्यापकता आई| यह अधिक सहज और सरल हुई इसलिए आज अंतरजाल पर
हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाएं प्रस्तुत हैं इसके अलावा लेखकों के अलग अलग
ब्लॉग्स तो हैं ही|
गूगल ने फेसबुक, क्वोरा, व्हाटसेप
के ज़रिये भारतीय भाषाओं को नई जीवन रेखा दी है| ऑनलाइन
पुस्तकालय किनडल ने बहुत ही सस्ते दामों पर हिंदी की किताबें उपलब्ध कराई हैं इससे
लोगों में हिंदी पढने लिखने में फिर से रूचि जाग्रत हुई है|
भारत के नेता या राष्ट्राध्यक्ष विदेश जाते हैं
तो वे हिंदी जानते हुए भी अंग्रेजी में बोलत्ते है-- पर क्यों? वहां
पर दुभाषिये भी होते हैं| आज हमारे प्रधानमंत्रीजी ने हिंदी में
बोलकर देश का गौरव बढाया है चाहे वह अमेरिका का मेंन्स स्कुवायर हो या जापान या
फिर कोई मुस्लिम राष्ट्र| प्रधानमंत्रीजी समझते हैं कि हिंदी
हमारी भावनाओं से जुड़ी हुई है साथ ही उनकी राजनैतिक इच्छाशक्ति भी जबरदस्त है|
जब
हमारे प्रधानमन्त्री बोलते हैं तो इसका सीधा सीधा असर मंत्री मंडल, कैबिनेट
सचिव, राज्यस्तरीय सचिव, राज्यपालों व विदेश सेवा से जुड़े लोगों
पर होता है| मोदीजी ने केन्द्रीय सचिवालय में हिंदी का
प्रयोग अनिवार्य कर दिया है| इसका विरोध तमिलनाडू ने किया पर विरोध
साथ के दशक जैसा नहीं था| कुछ नारे भी ऐसे दिए ताकि दक्षिणी
राज्यों को हिंदी थोपी हुई ना लगे| जैसे ----“स्वच्छ भारत
सुन्दर भारत”, “सबका साथ सबका विकास”|
दुरूह शब्दों से भरी हिंदी कभी जनता को स्वीकार्य नहीं हुई| आज़ादी
के फ़ौरन बाद बने पारिभाषिक शब्द या आकाशवाणी
के समाचार में प्रयुक्त भाषा के रूप में ये हिंदी, हिंदी के प्रति
अरूचि पैदा करती थी| लोग इनका प्रयोग लतीफे गढ़ने में करते थे|
जैसे
---हमारे द्विचक्र वाहिनी के अग्र चक्र की वायु निष्कासित हो गयी है| कृपया
अपने वायु ठूसक यन्त्र दुवारा अग्र चक्र में वायु अग्रेषित करने की कृपा करे|
फिल्म
के पुरूस्कार समारोह में भी नायक नायिकाओं से अंग्रेजी के शब्दों की हिंदी बताओ
जैसे खेल रखे जाते थे| ट्रेन मायने क्या---- लौह पथ गामिनी| अतः खडी बोली ने
बेहतर अभिव्यक्ति का माध्यम बन, जनता के बीच जगह बनाई|
स्त्रियों, दलितों, पिछड़ों जैसे
हाशिये पर सिमटे लोगों की राजसत्ता में भागीदारी बढ़ने से जनसामान्य के बीच हिंदी
बोली जाने लगी| इससे दो फायदे हुए एक तो हिंदी अखबारों के पाठक
बढे और दूसरे- व्यवहार में आने वाली हिंदी के शब्दों में अधिकाँश की व्यत्पुत्ति
का स्त्रोत संस्कृत नहीं था|
विदेशी छात्रों की हिंदी सीखने की संख्या बढ़ी जिसमें अधिक संख्या में चीनी
छात्र भाग लेते हैं ताकि चीन में हिंदी जानने वाले नौजवान तैयार किये जा सके, जिनके
ज़रिये भारतीय बाजारों में घुसा जा सके|
सूचना प्रौद्ध्योगिकी के चलते भारतीय नौजवान चिन्नई, बंगलूरु,
हैदराबाद,
पूना
जैसे महानगरों में गया है जिससे वहां पर हिंदी का प्रचार प्रसार ही नहीं बढ़ा है
बल्कि तीज त्योहारों को भी धूमधाम से
मनाया जाने लगा है| इस प्रकार रोज़गार व बाज़ार की ज़रूरतों के कारण
हिंदी आगे बढ़ पाई है|
हिंदी की हनक क्लर्क से लेकर
अफसर बनाने वाली प्रतियोगी परीक्षाओं में भी कायम हो गयी है| कर्मचारी
चयन आयोग ने (सीजीएल) और (सीएच्एसएल) में निबंध व पत्र लेखन को अनिवार्य कर दिया
है| लोक सेवा आयोग की सर्वोच्च सिविल सेवा व राज्य की पीसीएस परीक्षा में
भी हिन्दी का काफी महत्त्व है| इसी कारण स्नातक में प्रवेश के वक्त
हिन्दी की सीट सबसे पहले भरती हैं |
आज हिंदी के उत्थान के लिए हम क्या कर सकते है
------------
हिंदी को दुनिया की विकसित भाषाओं के बीच अपनी जगह सुरक्षित रखनी है तो हमें बहुत सचेत रहना
होगा| खाली राजभाषा बनाकर ही खुश नहीं रहना है| देवनागरी लिपी
के यूनीकोड से कम्पूटर और इंटरनेट पर हिंदी का चलन का रास्ता सुगम हो गया है|
अब
असली चुनौती है विज्ञान व तकनीक के माध्ययम भाषा के रूप में उसकी विश्वसनीयता और प्रासंगिकता| यहीं
पर हम हिंदी परिवार के सदस्य निढाल हो जाते हैं| ज़रूरत है तो बस
मानसिकता बदलने की| इसकी शुरूआत घर से होनी चाहिए|
१. बच्चों
से हमेशा मातृभाषा में ही बात करें| हिन्दी किताबें, पत्र पत्रिकाएं
खुद भी पढ़ें और बच्चों को भी पढने के लिए प्रेरित करें|
आईसीसीआई
बोर्ड ने भले ही मात्राओं की त्रुटियों पर नंबर नहीं काटने का फैसला लिया हो पर आप
हमेशा सजग रहकर मात्रा सम्बन्धी त्रुटि पर बच्चे का ध्यान दिलाएं|
२. यह
रवैया कभी न रखें कि क्या ज़रूरत है हिंदी पर इतनी मेहनत करने की, बस
परीक्षा में पास भर हो जाओ| आगे हिंदी कभी भी काम नहीं आने वाली|
याद
रखिये आपका यह रवैय्या राष्ट्रभाषा का अपमान है| यह अपराध आप तो
कर ही रहे हैं,बच्चों में भी गलत संस्कार डाल रहे हैं|
३. हिन्दी
की पढ़ाई रोज़गार से जुडी होनी चाहिए नहीं तो प्राध्यापकी के अलावा और कोई विकल्प
नहीं रह जाता| ख़ुशी की बात है कि अब रचनात्मक लेखन, अनुवाद,
पटकथा
लेखन, पत्रकारिता के क्षेत्र में हिंदी जाननेवालों की बहुत मांग है|
हिंदी
न्यूजचैनल पर नए उद्घोषकों ने बहुत अच्छा काम किया है|
४. किसी
भी विद्यार्थी, अधिकारी या कर्मचारी को हिंदी के लिए पुरुस्कृत
करने का मापदंड केवल हिंदी दिवस में किये गए उत्कृष्ठ कार्य के लिए ही नहीं होना
चाहिए| पूरे साल के दौरान किये गए कार्य से उसको जोड़ना चाहिए| प्रौन्नति
में हिंदी में कार्यकुशलता को आधारबिन्दु बनाया जा सकता है, अतिरिक्त बोनस
भी दिया जा सकता है|
५. उन
अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं के खिलाफ व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से पत्र लिखकर
अभियान चलाना चाहिए और उन्हें कहना चाहिए कि इस प्रकार की हिंगलिश को अविलम्ब
स्थगित करें (जो हिंदी में अंग्रेजी शब्द ज्यादा उपयोग में लाते हैं) नहीं तो हम
सब आपकी पत्रिका या अखबार को पढ़ना बंद कर देंगे|
६. व्हाट्सऐप,
फेसबुक,
क्वोरा
आदि पर जो भी हम लिखें सब ज्यादा से ज्यादा हिंदी में हों| कोशिश करे खुद
ही आज के विचार, अनमोल वचन, अपने अनुभव,
मन
की बात सब हिंदी में लिखे| मेहनत ज़रूर है पर उद्देश्य पूर्ण होगा|
७. RIP,
HBD जैसे
शौर्टकट मारने की अपेक्षा हिंदी में अपनी प्रतिक्रिया को महत्व देना, आपको
ही सिखाना है| हाल ही में फेसबुक पर “लघुकथा के
परिंदे” के मंच पर पाठकों को इमोजी के बजाय अपनी प्रतिक्रियाएं लिखकर देने का
अनुरोध किया गया है|
८. भाषा
संस्कृति से जुडी है अतः तीज त्योहारों के बारे में अधिक से अधिक जानकारी परिवार
के सदस्यों को दें| जैसे अब गणेश पूजा महाराष्ट्र का त्यौहार न
होकर पूरे देश का हो गया है| छठ बिहार से निकलकर पूरे देश में मनने
लगी है|
९. जन्मदिन ,वैवाहिक
वर्षगाँठ आदि पर शुभ सन्देश, आशीर्वाद सब हिन्दी में ही लिखें|
विवाह
के निमंत्रण पत्र हिंदी में लिखें|
१०. अपने हस्ताक्षर हिन्दी में करें|
इस प्रकार हम देखते है हिंदी अभी तक मनोरंजन की भाषा है ,खरीददार
की भाषा है,बाज़ार की भाषा है| अब इस हिन्दी को
शोध व उत्पादन की भाषा बनाना है| जो हिंदी अपने आधार पर मजबूत है वह
शिखर पर शायद नदारद हो जाती है| आधार की इस भाषा को शिखर की सोच में
बदलना ही सबसे बड़ा काम है| यह भी
होगा ज़रूर होगा क्योंकि अब हिंदी समय से जुड़ रही है समय के बदलावों से जुड़
रही है| अपने देश में मौलिक चिंतन और सृजन की अनवरत यात्रा केवल और केवल
हिंदी से ही हो सकती है|
मनीषा सक्सेना
जी १७ बेल्वेडीयर प्रेस कम्पाउंड
प्रयागराज २११००२
http://manishaasblog.blogspot.com/
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