Wednesday, 18 September 2019

लघुकथा 29 हिंदी का मायका



हिंदी का मायका

       पिछले एक हफ्ते से हिंदी बहुत उदास है|चौदह सितम्बर से उसके स्वागत में कार्यक्रम किये जा रहे है| उसे ऐसा लग रहा है जैसे मन से किसी को भी अब उसकी परवाह नहीं है और इसी लिए सब जगह भारी भड़कम कार्यक्रम करके, दिखावा किया जा रहां है| हाँ हाँ तुम अब भी हमारी हो......... देखो हम सब तुम्हें कितना याद किया करते है| दिया जला कर मां सरस्वती का आव्हान किया जा रहा है| आगुन्तकों का फूलमालाओं से स्वागत कर श्रीफल और शौल देकरउनसे हिंदी बोलने- लिखने की प्रार्थना की जा रही हैं..... पर आखिर क्यों?मैं कोई सास हूँ जो इतना दिखावा हो रहा है| भारत मेरा मायका है.....सबके अवचेतन मन में रची बसी हुई हूँ मैं तो ......|हारी बीमारी, सुख-दुःख, शुभकामनाएं, शुभाशीष देते समय सब मुझे ही याद करते आये हैं| फिर अब.....ये सब क्यों? दिया जलाना,  आरती गाना...... फूलमाला पहनाना|प्रसाद का लड्डू मुंह में ठूँसकर सब लोग यूं ही हाथ पे हाथ धरे क्यों बैठे हैं|
      मैं तो स्वतंत्रता से कलकल बहने वाली नदी हूँ जिसमें सारी चचेरी, मौसेरी, ममेरी, फुफेरी बहिनेसाथ साथ रहती हैं| अपनी इन्हीं भोजपुरी, अवधि, ब्रज, उर्दू, जैसी बहिनों के कारण ही मैं इतनी मीठी व सशक्त बन पाई हूँ| तुम्हारी मुंहबोली बहिन अंग्रेजी का भी आदर करती हूँ पर मैं ये भी देख रही हूँ कि तुम लोग उसका सम्मान मुझसे ज्यादा करते हो....... तो बताओ, मुझे बुरा नहीं लगेगा ...सगी बहिन को भूल कर मुंहबोली बहिन को ज्यादा तवज्जो........ ये कौनसा नियम है? और तो और अपने बच्चों को भी मुझसे मिलवाने से हिचकते हो ....बोलो जवाब दो|
     याद करो वो ज़माना जब स्वत्रंत्रता सग्राम में वीरांगना सी मैं लड़ी थी| आज पूरे देश में हर राज्य के लोग मुझे गले लगाते हैं|विदेशों में भी मैं अपनी लालिमा बिखेरती हूँ| मेरा शब्दकोष भी बहुत गहरा है क्योंकि मैं देश की ही नहीं विदेशी बहनों को भी समुचित आदर के साथ, अपने में शामिल करती हूँ परअपने ही घर में एक दिनी या सप्ताहिकी दिखावटी आदर प्रदान किया जाना...... मुझे बिलकुल नहीं सुहा रहा है| खुश तो मैं तब होउंगी जब तुम सब अपने दैनिक क्रियाकलाप के साथ तकनीक में भी मुझे शामिल करोगे| मेरा विश्वास है कि ये काम भी ज़रूर होगा| तुम करो या न करो पर आने वाली पीढ़ी ज़रूर करेगी| जब विदेशी तुमसे मेरे बारे में पूछेंगे तो तुम उनको क्या कहोगे........ अपनी नज़रों में तो गिरोगे ही तुम्हारे अपने बच्चे भी तुमको इसके लिए कभी माफ़ नहीं करेंगे| अब भी समय है, चेत जाओ ......मेरा तो मायका है...... इसको दुनिया की कोई ताकत झुठला नहीं सकती तुम भी नहीं .......
मनीषा सक्सेना
जी १७ बेल्वेडीयर प्रेस कम्पाउंड
प्रयागराज २११००२

No comments:

Post a Comment