Monday, 23 September 2019

लघुकथा २७ सर्वश्रेष्ठ कौन



सर्वश्रेष्ठ कौन
          समय के चार पहर की सहेलियां एक दूसरे को जानती नहीं पर एक दूजे के वजूद से वाकिफ़ हैं| सूर्योदय होते ही आती है ऊषा| जोश ताजगी से भरी,दिन की शुरूवात करती, लालिमा लिए हुए, कुछ करने का माद्दा रखते हुई, आशा का संचार करने वाली|दोपहरिया –तप कर सोना बनाने वाली,अनेकानेक प्रयोग करके अपने को सार्थक करके, संतुष्टि प्राप्त करने के लिए बावली सी,अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करने से भी नहीं चूकतीहै|इसके बाद आती है मदमस्त संध्या,सान्ध्यदीप जला कर निशा को बुलाती हुई, छोटी ही सही पर खुशियाँ देती हुई|अंत में आती है निशा, सबको अपने आगोश में लेने को आतुर| कितना ही कोई थका हारा क्यों न हो सबको अपने में समा लेती है, अमन चैन कायम रखती है|
          यहाँ तक तो ठीक था कि सब बारी बारी से आती और अपना महत्वपूर्ण काम करके चली जाती पर आपस में झगडा तो तब शुरू हुआ जब दोपहरिया ने उषा निशा की सीमाओं में घुसना शुरू कर दिया| तर्क दिया कि “जीवन में कर्म का पाठ मैं पढ़ाती हूँ,मैं न होऊं तो सबकुछ टूट कर बिखर जाएगा|”“मैं ही तो टूटे बिखरे को अपने में समेटती हूँ, जान डालती हूँ” निशा ने अपना महत्व बताया|“ठीक है ,माना तुम जान डालती हो पर आशा का सन्देश देकर फिर से प्रेरित तो मैं ही करती हूँ” ताजगी से भरी उषा बोली| “कुछ भी कहो मैं संध्या आज भी सबकी चाहत हूँ, चहेती भी हूँ ,भले ही दोपहर ने मुझे अपने में समावेशित कर लिया है इसी कारण दोपहर ने अपना नाम खो दिया है और सुकून से भरे दो पल की संध्या, सबका सपना है| अतः मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ, यकीन न हो तो मानव से पूछ लो -------सर्वश्रेष्ठ कौन?”
मनीषा सक्सेना  
प्रयागराज २११००२


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