Monday, 23 September 2019

लघुकथा २८ गिनती का महत्व


  
छोटी सी बात
              घर में अलमारियों के बनने का काम चल रहा है छुट्टियों में बेटा भी अपने परिवार सहित आया हुआ है|बढई ने सामान मंगवाने के लिए बुलाया मैंने ईशान पोते से कहा पेपर पर सामान की लिस्ट बना लो|पोते को देख बढई भी जोश में आकर सांमान लिखवाने लगा----- तीन गुणा आठ फुटी छःजोड़ी लकड़ीके फट्टे,दो शीट सनमाइका,चार इंची के दो दर्जन स्क्रू,आधा इंची की दो सौ कीली| वह कुछ समझा--- कुछ नहीं ------रुआंसा सा बोला “दादी, बढई काका हिन्दी में नाप बोल रहे हैं मुझे हिंदी में समझ नहीं आता|” बढई ने उतने ही ठसके से कहा “हमको भी अंग्रेजी नहीं आती|भईया जी को कहें वही आकर लिस्ट बनावें|” पास ही खड़ी महरी बोली “हाय दईया, इसानभैया को हिंदी में लिखना नहीं आता|” “आता है पर हिंदी की गिनती नहीं आती, स्कूल में सारा गणित अंग्रेजी में होता है|
बेटा बहू दोनों शर्मिन्दा थे क्योंकि मेरे बार बार कहने के बावजूद भी उन्होंने ईशान को हिंदी की गिनती सिखाने की कभी कोशिश ही नहीं की| उनका तर्क था “मम्मी,जब हमें ही हिंदी की गिनती का काम नहीं पडा तो हमारे बच्चे तो फिर अगली पीढी के हैं |महानगर में तो सारा सामान माँल से आता है और छोटा मोटा बिल्डिंग की दूकान से,पेमेंट भी पेटीएम या कार्ड से हो जाता है|”“ठीक है, अपनी मातृभाषा में तो गिनती तो हर बच्चे को आनी ही चाहिये| कितने ही बड़े इंजीनियर बन जाओ काम करते वक्त तो तुम्हारा वास्ता कामगारों से ही पडेगा और उनकी भाषा तो समझ में आनी ज़रूरी है| तुम लोगों की इस सोच के कारण बेटा बढई की हंसी का पात्र बन गया|”
“सौरी बेटा, मैंने तुम्हें हिंदी की गिनती नहीं सिखाई”|
“कोई बात नहीं डैड, मैं दादी से सीख लूँगा और बढई काका के साथ रोज़ प्रेक्टिस भी कर लूंगा|
आँखों में आंसू देख कर बोला “डैड बड़े बड़े शहरों में छोटी छोटी बाते होती ही रहती हैं ---------कह कर गले से लग गया|
मनीषा सक्सेना  
प्रयागराज २११००२


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