Tuesday, 10 September 2019

ठहराव


ठहराव
ट्रेन द्रुत गति से भागी जा रही है और मेरा मन उससे दुगने वेग से दौड़ रहा है|पतिदेव स्टेशन पर उतरे थे,अभी तक डिब्बे में नहीं आये|पता नहीं चढ़ पाए कि नहीं... आधा घंटा होने को आया|शौचालय में तो इतनी देर नहीं लगाते हैं| इनका फोन भी यहीं चार्जिंग में लगा है|लाख बार मना किया है अब उम्र का तो ख्याल करा करो, सिर्फ पांच मिनिट का ठहराव है, मत उतरो ....पर नहीं ... “अभी बस पैर सीधे करके आता हूँ| चढ़ जाऊँगा, फिकर मत करो|” करूँ तो क्या करूँ ....
          पिछले दो बार से ऐसे ही हो रहा है ...जनाब स्टेशन पर ट्रेन रूकते ही, उतर जाते हैं| पहली बार भोपाल जाते वक्त उतरे थे ... दो मिनिट बाद ही ट्रेन चल दी,मैं दौड़कर दरवाज़े तक गयी|कहीं दिखे नहीं| फोन मिलाया तो घंटी जाती रही ...अगले स्टेशन पर ट्रेन रूकी तो हाथों में समोसे लेकर चले आये, चिढ़कर मैंने शिकायत की कि फोन क्यों नहीं उठा रहे थे? झुंझुलाकर बोले “स्लीपर के डिब्बे में सुनाई देता है क्या? फोन नहीं मिलरहा है, तो मैसेज करना था,वो तो मैं हमेशा पढता हूँ|”
दूसरी बार पूना जाते वक्त उतरे थे तब मैं सो रही थी वो भी ऊपर की बर्थ पर ...सहयात्री ने उठाया “भाभी जी, भाईसाहब कटनी स्टेशन से दिख नहीं रहे हैं काफी देर हो गयी है|” मैंने घबरा कर फोन टटोला तो याद आया, सोने से पहले इनको पकड़ाया था| परेशान होकर सहयात्री से मदद मांगी तो इनका नंबर ही याद न आये| जनवरी के महीने में पसीने से तरबतर -----जैसे तैसे अपने फोन का नंबर याद आया, मिलाया तो..... “हाँ हाँ चढ़ गया हूँ, एसी टू टियर से दरवाज़ा बंद है इसलिए पहुँच नहीं पा रहा हूँ” आवाज़ सुनकर जान में जान आई थी|
अब हैदराबाद जाते समय फिर वही... इस बार तो कुछ करना ही होगा.... आने दो छोडूंगी नहीं.....अपनी उम्र देखते नहीं, बस उतरने का शौक है| ट्रेन में चढ़ते वक्त हड़बड़ी में पैर फिसल जाए, धक्का लग जाए,कुछ समझने को तैयार नहीं...बस उतरना ज़रूरी है| मन ही मन बडबड करती हुई....दोनों फोन हाथ में थामें... हर केबिन में झांकते हुए... शौचालय की तरफ बढ़ी| टी टी भी कहीं दिख नहीं रहा है| एसी डब्बे का दरवाज़ा खोला तो महाशय अटेन्डेन्ट की सीट पर किसी से बातें कर रहे थे| गुस्से में मुंह से बस इतना निकला “हद करते हैं आप” और तुरंत मुड़कर वापिस अपनी सीट पर जा बैठी| दस मिनट बाद आकर बोले “इतना क्यों डरती हो डिब्बे में ही तो बैठा हूँ”| “हद कर दी है आपने मुझे पता है क्या ...कहाँ खोजूं जाकर ...फोन रखा है नहीं| ट्रेन चले आघे घंटे से ऊपर हो गया ...शौचालय की बत्ती हरी है ...टी टी भी नहीं है ...और एक आप हैं कि गप्प मार रहे हैं|” “इतने सालों बाद परिचित साथी मिला तो बात करने लग गया”|  “इस समय वो शख्स मुझसे ज्यादा महत्वपूर्ण है?” “तुम तो बेकार की बातें करती हो” “ठीक है, यही हरकत जो आपने की है, वही यदि मैंने की होती, तो आप क्या करते बताइये? अब अगले स्टेशन पर...... मैं ...नीचे.... उतरूंगी|” मेरा समूचा शरीर काँप रहा था और इनके होंठ .... |
एक घंटे बादविजयवाड़ा पर ट्रेन रूकी| इन्होंने मेरे हाथ पर अपना हाथ रखा और हम मुस्कुरा दिए| मैंने इन्हें फोन पकड़ाया--------“दस मिनिट ठहरेगी, इसी डिब्बे में ना चढ़ पायें तो कोई बात नहीं----- फोन कर दीजियेगा”| ये फिर पैर सीधे करने चल दिए .......

मनीषा सक्सेना
जी १७ बेल्वेडीयर प्रेस कम्पाउंड
प्रयागराज २११००२


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