Wednesday, 25 September 2019

लघुकथा 31 पापा जब बच्चे थे


लघुकथा ३१ पापा जब बच्चे थे

पापा जब बच्चे थे

मीठी को रोज़ एक कहानी दादी से सुनने की आदत है|
“दादी आज एकदम नयी कहानी सुनाओ|”
 “कौनसी…… राजा रानी, अकबर बीरबल, गांधीजी, सरदार पटेल, .....”
 “नहीं ये सब तो मुझे बाबाजी ने सुना दी हैं| आप एकदम नयी वाली सुनाओ ना|”
 “अच्छा तो मैं तुम्हें सूर्पनखा व लक्ष्मण की कहानी सुनाती हूँ|”
“नहीं, ये भी मुझे आती है|”
“तो फिर जातक कहानियाँ…. एनीमल्स वाली .....”
“ये भी मुझे मालूम हैं..... बन्दर, मगरमच्छ, बिल्लियों, शेर चूहे, रंगा सियार वाली सब मुझे याद हैं दादी|”
 “तो फिर कौनसी सुनाऊं?”
 “अच्छा कोई बात नहीं याद नहीं है तो, मैं मम्मी से मोबाइल लेकर आती हूँ आप गूगल खोलकर यु ट्यूब में से सुना दो|”
“अरे रुको रुको ......मैं तुम्हारे पापा छोटे थे तो क्या शैतानी करते थे उसकी कहानी सुनाऊं?”
 “पापा शैतान बच्चे थे” मीठी ने चौंककर पूछा|
 “हाँ ,,,,बचपन में सब बच्चे नटखट होते हैं|”
“हाँ ....हाँ ......दादी प्लीज़ सुनाओ ना....”
“तुम्हारे पापा लगभग तुम्हारे जितने या शायद उससे भी शायद छोटे रहे होंगे|”
 “मैं अभी ९ साल की हूँ तो पापा.....”
“हम्म ......शायद ६ साल के ...”
 “ओ के|”
 “हम लोगों ने शिमला घूमने का प्रोग्राम बनाया| एक सूटकेस और एक बैग में सामान भरकर  तांगे में रखा| पानी की बोतल व टिफ़िन का डिब्बा पापा ने अपने पास ही रखा| रेलवे स्टेशन पर आये और प्लेटफॉर्म पर गाडी आने का इंतज़ार करने लगे|”
 “दादी ये बताइये आप लोग तांगे से स्टेशन क्यों आये, आप लोगों को ओला टेक्सी नहीं मिली क्या?”
 “बेटा उस ज़माने में तांगे ही चलते थे| ऑटो भी थे पर इक्का दुक्का| खैर हम सब ट्रेन आने का इंतज़ार करने लगे| तुम्हारे पापा प्लेटफॉर्म पर घूम रहे थे|”
“अरे दादी आपके पास नहीं बैठे| कोई पकड़ के ले जाता तो?”
“उस ज़माने में प्लेटफार्म पर इतनी भीड़ नहीं होती थी न.... और फिर हम लोग तो उनको देख ही रहे थे | अचानक पापा दौड़ते हुए आये और अपना टिफिन कस के पकड़ कर ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगे कि मां मां सारा सामान भागा जा रहा है|”
 “आयं ,.....ये कैसे? सामान थोड़े ही भागता है दादी|”
 “सोचो और बताओ ऐसे क्यों बोला?”
 “पता नहीं .....हारी .. आप बताओ .”
“तुम्हारे पापा ने बिलकुल ठीक कहा था| ऐसा होता है जब दूसरी बगल वाली पटरी पर ट्रेन चलती है तो हमें भ्रम होता है कि हम चलने लगे हैं तो वही भ्रम उनको भी हुआ|”
 “ऐसे कैसे दादी......”
 “अबकी बार ट्रेन में बैठो तो ध्यान देना----जब तुम्हारी ट्रेन खड़ी हो और बगल वाली ट्रेन चलने लगे तो तुम्हें ऐसा लगेगा कि तुम्हारी ट्रेन चलने लगी है|”
 “ये तो बहुत मजेदार बात है दादी|”
“उससे भी मज़ेदार बात तो ये है कि पापा को जब प्लेटफार्म चलने का भ्रम हुआ तो पेटूराम ने दौड़कर सबसे पहले अपना टिफिन पकड़ा|”
 “ओ फ़ो ....दादी, बाक़ी सामान बड़े थे ना........ तो फिर कैसे पकड़ते?”
“हाँ.....  ये बात तो है मेरी दादी अम्मा ......   
मनीषा सक्सेना
प्रयागराज

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