Monday, 23 September 2019

लघुकथा ३० ----अनावश्यक भार



अनावश्यक भार

रूपेश व मिताली की मन मांगी मुराद दो साल बाद आज पूरी हो गयी| डॉक्टर ने मिताली की गर्भवती होने की पुष्टि कर दी| साथ ही अनेक सावधानियों के साथ, खाने में क्या क्या खाना है उसकी लिस्ट भी चार्ट बना कर समझाई| फौलिक एसिड, विटामिन, आयरन की गोलियों के साथ साथ खाने में दूध, अंडा रोज़ लें| मांसाहारी हैंतो लाल मांस की बजाय चिकिन,मछली को प्राथमिकता देने को कहा है| अंकुरित अनाज, हरा साग, सलाद, मौसमी फल लेने को कहा ताकि कब्ज़ ना हो|
मिताली को चिंतित देखकर रूपेश ने छेड़ा “अभी से तुम्हारा ध्यान हमारे बच्चे की ओर लग गया है मेरा भी तो कुछ ख़याल करो|”
 “नहीं ये बात नहीं है,मांजी को पता चलेगा की अंडा रोज़ खाना है,मछली भी रोज़ खा सकते हैं तो वो तो बिखर जायेंगी| आज तक उन्होंने सोमवार, मंगल, गुरूवार, शनिवार को अंडा बनाना तो दूर खाने तक नहीं दिया है|”
”तुम बेकार में अपने मन में बोझ न रखो, सबको समझाया जाएगा|” घर पर मांजी ने खुशखबरी सुनी तो वो फूली नहीं समाई|अच्छा मां एक बात बताइये की आपको एक बाल्टी पानी में आपको बालकनी में रखे तीसों गमलों में पानी देना हैतो आप क्या करेंगी?”
“थोड़ा थोड़ा सबमें दूँगी या जिसमें ज्यादा ज़रूरत होगी उसमें ज्यादा दूंगी|”
“यदि कहा जाए कि एक दिन छोड़ कर पानी दें तो ......”
“पौधे को पूरीखुराक नहीं मिलेगी और वे अच्छी तरह नहीं पनपेंगे”|
“मां डॉक्टर ने कहा है कि आपके नाती की अच्छी बढ़वार के लिए मां का विटामिन व आयरन लेना ज़रूरी है इसलिए अंडा भी रोज़ लेना चाहिए|”
“हाँ क्यों नहीं,बस मंगल और शनिचर को हनुमान जी के दिन होते हैं उस दिन न लो|”
“मां जी अभी पितर चल रहें हैं अभी कैसे खायेंगे?”
“मां ये तुम्हारी बहू है न.... समझाओ इसे... रोज़ सारी चीज़े थोड़ी थोड़ी खाना है.... नहीं तो तुम्हारा फूल जैसा नाती मुरझाने लगेगा....बिना बात में दिल पर बोझ लिए घूम रही है अभी ये नहीं खाना है आजसोमवार है, इस दिन शनिवार है वगैरह वगैरह”|
“न न बेटा बच्चों के मामले में सारे दिन बराबर होते हैं ऊँच नीच कुछ नहीं होता है”
“मांजी आप तो शुरू से ही ये तीज त्यौहार मनाती आई हैं और सब कुछ मानती भी हैं”
“हाँ बहू तुम्हें सब इसलिए बताती और कराती आई क्योंकि तुम पढ़ाई पूर्ण करके सीधे ही शादी के बाद मेरे पास आ गयी| यहाँ नाते रिश्तेदारों के बीच तुम्हें रहना है अतः तीज त्यौहार पर खानपान कैसा हो ये सब तुम्हें पता होना चाहिए ताकि समाज में उसके अनुकूल व्यवहार कर सको  .....अच्छा ये सब छोड़ो .....बताओ बहू क्या खाना है, वही बना देती हूँ”
“नहीं मां डॉक्टर साहब ने इसे हाथ पे हाथ धर कर बैठने को थोड़े ही कहा है| जितना हो सके उतना ही करना है, चलते फिरते रहना है|” “जाओ भई चिकिन सूप सबके लिए बना लाओ|हमें भी तो ताक़त लानी है|”
मिताली के मन से एक अनावश्यक बोझ उतर गया उसने कृतज्ञतापूर्ण दृष्टि रूपेश पर डाली और मुस्कुराकर सूप बनाने चल दी|
मनीषा सक्सेना
प्रयागराज

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