Friday, 28 July 2017

लघुकथा------सच्चा मित्र


सच्चा मित्र
“मेरा हाथ छुड़ा के मत जाओ”
“मैं कहाँ जा रहा हूँ मैं तो तुम्हें और हरा भरा करके सम्पन्न कर रहा हूँ| फ़ालतू व अनुपयोगी बड़े पेड़ों को हटा करा अपने मानव साथियों के लिए जगह बना रहा हूँ |”
“मत करो मित्र इसके कारण प्राकृतिक संतुलन बिगड रहा है| प्राकृतिक आपदाएंजैसे सुनामी, बाढ़ ,भूकंप,सूखे की मार झेलकर भी तुमने सबक नहीं लिया |”
“मुसीबतों से निबट लूंगा|”
“खेती लायक जमीन ही नहीं बचेगी तो क्या करोगे?”
“मैंने थोड़े से संसाधनों से ही हरित क्रान्ति ,श्वेत व नीली क्रान्ति करके भरपूर पैदावार कर ली है| नए अनुसंधान के तहत टिशु कल्चर सेबिना बीज की सहायता से हज़ारों फल व फूल के पौधे तैयार कर लिए हैं, जो छोटे में ही ढेरों देते हैं |इतना ही नहीं जींस में थोड़ा सा परिवर्तन करके प्रतिकूल मौसम में भी सब्जी व फल का मज़ा लेते हैं|जैसे साल भर मिलने वाला छोटा तरबूज़, चेरी टमाटर,बिना बीज का अंगूर आदि |”
“तुम्हें पता है जो प्रक्रिया सैकड़ों वर्षों में पूर्ण होती उसे तुमने एक झटके में करने की कोशिश की है ,प्रकृति में सहजीवन की धुरी हैं हम दोनों |इसका पता तुम्हें ढाई हज़ार साल बाद पता चलेगा जब जींस में परिवर्तित सब्ज़ी फल का उपभोग आने वाली पीढी करेगी और तुम्हारी नस्ल भी इससे प्रभावित होगी |अभी भी समय है दोस्त मेरा साथ मत छोड़ना| ऑर्गनिकखेती अपनाओ |आने वाली पीढ़ी हमें दुआ देगी |
मनीषा सक्सेना
इलाहाबाद 

Sunday, 23 July 2017

लघुकथा ------नया प्रोजेक्ट


नया प्रोजेक्ट  
आन्या कॉलेज से लौटकर आई और सीधे ही बिस्तर पर लेट गई आठवां महीना पूरा हो चुका था| घर में कोई था भी नहीं और पेट में भी हल्का हल्का सा तनाव लग रहा था |इतने में ही घंटी बजी, लगता है विनीत आ गया |दरवाज़ा खुलते ही पेट को सहलाते हुए उसने पूछा “आज मेरा बच्चा क्या कर रहा है” | “पता नहीं आज मैं उसकी तरफ ध्यान ही नहीं दे पाई| आज पहले क्लास थी, फिर प्रेक्टिकल्स लेने थे| भाग-दौड़ ही  रही| कॉलेज में भी प्रसव से पहले बच्चों के कोर्स भी पूरे कराने हैं| सब काम मैं अकेले सम्भाल नहीं पा रही हूँ| खैर ----तुम्हारा दिन कैसा बीता?नए प्रोजेक्ट का क्या रहा कुछ आगे बात बढ़ी?”
“हाँ पैसों का इंतजाम तो हो ही जाएगा, बस अपनी भागादौड़ी कम कर पाना थोडा मुश्किल है|मैं सब संभाल लूँगा |तुम परेशान मत हो |”
“पर ये नया प्रोजेक्ट तुम देर से----- मेरा मतलब है--- अपने बच्चे के थोड़ा बड़ा हो जाने पर ले लेते |”
“बच्चा तो अपना ही है ना----डॉ.सहाब से भी मिला था ,कह रहे थे सहायता के लिए आया से अच्छा है घर के किसी बुज़ुर्ग को बुला लीजीये उसकी देखरेख में आया की सहायता ली जा सकती हैं |”
“पता नहीं आज सुबह से ही पेट में बहुत हलचल है क्लास लेते समय भी बीच बीच में बैठना पड़ता था”
“कोई बात नहीं, आराम से लेटो| वो खुद अन्या के बगल में लेट गया और उसके पेट पर हाथ फेरने लगा|
 “अच्छा तुम आँख बंद करो और थोड़ा सो लो |”
“छोटू आज तुमने मम्मा को क्यों परेशान किया ,मम्मा को आराम करने दो, थक गई हैं न!”  
“तुम तो ऐसे पूछ रहे हो जैसे वो सुन रहा है|”
“श श ------ये मेरी और उसकी आपस की बात है |तुम सो जाओ |” आन्या विनीत की तरफ करवट करके लेट गयी|आन्या के पेट पर हाथ फेरते हुए कहा –“क्या हुआ बच्चे ,पापा से बोलो”
“मुझसे आज किसी ने बात नहीं की, मैं बहुत गुस्सा हूँ|”
“पापा हैं ना, मैंने तुम्हारे लिए रिमोट से चलने वाले खूब सारे खिलौने बनाए हैं|”तुम्हारी मम्मा ने खूब सारी डॉल्स ,कपड़े, कहानी की किताबें वगैरह अलमारी में सजा दी हैं|
“मुझे कुछ नहीं चाहिए ,कोई मुझसे बात नहीं करता ,कोई मुझे प्यार नहीं करता”
“आज मम्मा ने आपको खाना नहीं खिलाया?”
“ठूस ठूंस कर खिलाया था पर बात नहीं की, ना ही लाड़ किया |”
“देखो विनीत कितनी जोर-जोर से हलचल हो रही है|”
“धीरे धीरे बच्चे, मम्मा सो रही है न” विनीत ने पेट को पुचकारते हुए थपथपाया |हलचल थोड़ी कम हो गयी |”
 “मम्मा तो आपसे कह रहीं हैं कि वो अकेले मुझे संभाल नहीं पाएंगी |आप लोग मुझे कहीं भेज देंगे? मुझे डर लग रहा हैं| 
नहीं ,तुम हम सबके लाड़ले हो,मम्मा की डॉल हो|
मुझे डॉल नहीं बनना है, आप लोग मुझे छोटी छोटी डॉल्स के साथ घर में छोड़ देंगे|
पापा का नया प्रोजेक्ट हैं न ,पापा ऐसा कभी नहीं करेंगे विनीत ने पेट को चूमते हुए कहा| तुम बड़े होकर जो करना चाहोगे मम्मा पापा तुम्हें सही सलाह के साथ पूरी सहायता करेंगे|
पेट की हलचल आश्वस्त होकर शांत हो गयी थी |
मनीषा सक्सेना
इलाहाबाद  


Saturday, 22 July 2017

लघुकथा ---आधार

आधार                  

          एक जानीमानी कंपनी में भर्ती चल रही थी| लिखित परीक्षा में पास होकर परीक्षार्थी इंटरव्यू देने आये थे|कंपनी के मालिक ने मैनेजर सहित तीन सदस्यीय कमेटी को हिदायत दी कि कम्पनी को ईमानदार, लगनशील, काम जाननेवाले, मेहनती ग्रेजुएट इंजीनीयर्स की आवश्यकता है| सदस्यों ने तीन सौ अभ्यर्थियों के नाम चुनकर कंपनी के मालिक को दिये| मालिक ने सबको बुलाया| सबके नंबर देखे, बातचीत की| तीन सौ में से २०० बच्चों का चुनाव किया गया | इन बच्चों में ८० प्रतिशत बच्चे सीधे से और कम नंबर वाले थे |
            कमेटी ने कौतुहल से मालिक से चुनाव का कारण पूछा| वे मुस्कुराये और बोलेकम प्राप्तांक वाले वे बच्चे हैं जो पढ़ाई की दृष्टि से, मेरिट में अव्वल हैं, पूरे देश की मेरिट के नंबर के आधार पर विभिन्न राज्यों के सरकारी कॉलेजों में इन्हें दाखिला मिलता हैं |”
“सरकारी कॉलेज में पढ़ाई कहाँ होती है सर? संसाधन तक तो जुटा नहीं पाते हैं|”
“सरकारी कॉलेज के अध्यापक खुद भी पी एच डी होते हैं और पूरे सत्र पढ़ाते हैं, हाँ कॉलेज में संसाधन कम हो सकते हैं पर इनमें पढने वालों का दिमाग तेज़ होता है |एक बात और, ज्यादातर बच्चे मध्यमवर्गीय परिवार से होने के नाते इनमें कुछ कर गुजरने  की इच्छा होती हैं|”
“और बाकी २० प्रतिशत सर?”
“सेल्स व मार्किटिंग के लिए स्मार्ट बन्दे चाहिए| ये तकनीकि काम थोड़ा कम जानते हैं| इनकी वफादारी पैसे से होती है| जहां ज्यादा पैसा मिलता है, उसी कंपनी की हो जाते हैं |
“पर ऐसे बच्चों की ज़रूरत क्यों है ,सर?”
“ये हाव –भाव से व बातों से ग्राहकों को अच्छा फंसा लेते हैं |इनकी ख़ास बात है--
व्यवहार कुशलता व लक्ष्य पर निगाह| कंपनी में ये लोग ज्यादा टिकते नहीं हैं पर काम के होते हैं |   
               चुने गये ८० प्रतिशत बच्चों में ज्यादतर सरकारी कॉलेजों के बच्चे थे जो कम्पनी के आधार हैं और ये देश को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं और बाकी मैनेजर की तरह प्राइवेट कॉलेज के थे|
मनीषा सक्सेना

इलाहाबाद 

Thursday, 20 July 2017

लघुकथा -------खोट



                                खोट
       देर से ही सही तीस साल की उम्र में आज लड़की की सगाई हो गयी| लड़का  बड़ी कंपनी में मैंनेजर के पद पर है| घर के अन्य लोग भी पढेलिखे सुसंस्कृत हैं| कोई मांग नहीं| उलटे खुद ही बेटी को इतना गहना कपड़ा चढ़ा गये| फल मिठाई भी भर भर कर लाए थे|मां कभी लड़की के भाग्य को सराह्ती तो कभी घुमा फिरा कर लड़के और उसके घर वालों से पूछती शादी में उनकी तरफ से कोई मांग हो तो वे निसंकोच बतायें| लड़के की मां बडी शालीनता से कहती इतनी पढ़ी लिखी अच्छे संस्कार वाली बेटी हमें मिल रही है और हमें कुछ नहीं चाहिये| बेटी की माँ दिल ही दिल में सोचने लगी शादी में अभी छ: महिने की देर है तब तक तो कुछ पता चल जायेगा| शादी का जब महिना भर ही रह गया और लड़के वालों के यहां से कोई मांग नहीं आई तो उसके मन में शंका आई...कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं, ये लोग कोई मांग नहीं कर रहें हैं| रहा नहीं गया तो पेपर पढ़ रहे पति से पूछा ---“सुनो जी, लड़के वालों ने अभी तक कुछ माँगा नहीं| मुझे तो बड़ी घबराहट हो रही है| कहीं ऐन वक्त पर अपना मुंह न खोल दें तब हम कैसे इंतजाम करेंगे? मैंने तो साफ़ तौर पूछा भी था दहेज़ में घर के सामान तो देंगे इसके अलावा हम और बड़ी चीजें कार वगैरह-----तो जल्दी से उन्होंने मेरे हाथ पकड़ लिए और कहने लगी हमारे पास भगवान का दिया सब कुछ है,बस एक प्यारी सी बहु ही चाहिए |”  
“तुम तो बेकार ही घबरा रही हो कुछ होता तो अपनी बेटी इशारा कर देती रोज़ ही तो उसकी लड़के से बातचीत हो रही है|”
“मेरी जानकारी में ये जो बच्चे कम्पूटर पर बातचीत करके शादी कर लेते हैं उनकी शादी ज्यादा दिन टिकती नहीं है|अपनी बेटी ज्यादा बाहर आई गई भी नहीं है |”
“आजकल के बच्चे पढ़े लिखे और अकलमंद होते हैं,अपना भला बुरा खूब समझते हैं|”  
“बेटी को ये अक्ल कहाँ? समझदार होती तो ३० साल की उम्र तक शादी के लिए बैठी ना होती |पता नहीं लड़का उसको क्या पट्टी पढ़ा रहा है |”
“लड़का क्या कहेगा? तुमने देखा नहीं सगाई के समय अपनी बेटी सबसे कैसे हिलमिल कर बात कर रही थी |कंपनी में मेनेजर वो भी है|रोज़ इतने लोगों के संपर्क में आती है , लोगों को अच्छे से समझती है |”
“ख़ाक समझदार है| कम्पनी में हरेक का काम करती रहती है |देखा नहीं सगाई के समय उसकी सास कैसी मीठी मीठी बातें कर रहीं थीं |जो ज्यादा मीठा बोलता है न उसके मन में कुछ और ही होता है |मेरा मन बहुत घबरा रहा है, ज़रूर कुछ घटने वाला है| कल रात को कुत्ता भी रो रहा था,सुबह से चीजें भी हाथ से छूट रहीं हैं |”
“अच्छा बताओ क्या हो सकता है, शादी की जगह- हमारी पसंद की ,खाने का खर्चा- हमदोनों पार्टी का आधा आधा ,पढ़े लिखे सुसंस्कृत लोग,सबसे बड़ी बात आजकल हमारी बेटी खुश रहती है और हमें क्या चाहिये |
“मुझे तो लगता है ज़रूर लड़के में ही कुछ खोट है जो उसके घरवाले हर बात मानते जा रहे हैं|”
“खोट लड़के में नहीं तुम्हारी पुराणपंथी विचारधारा में है इन्हीं सब बेकार की बातों में उलझ कर आज तक हम बेटी का रिश्ता कहीं भी पक्का नहीं कर पाए|”
मनीषा सक्सेना
इलाहाबाद  





Tuesday, 18 July 2017

लघुकथा----- सम्मान

सम्मान
ऑफिस से लौटते हुए रीना ने फल लिए और रोज़ की अपेक्षा आधा घंटा जल्दी घर पहुंची ताकि फल फ़्रिज में थोड़े ठन्डे हो जाए| घर में सास ने खूब सारी मठरी व आटे के लड्डू बना कर रखे हुए थे| वैसे तो रीना कुछ नहीं कहती है, सास की भावनाओं का सम्मान करती है| पर जबसे पति की शुगर की रिपोर्ट बार्डर लाइन पर आई है वह खाने पीने में बहुत सावधानी बरतने लगी है|उसने बड़ी विनम्रता से सास से कहा “माँजी मैं जानती हूँ आपको खाना बनाने, खिलाने का बहुत शौक है| आपके बेटे की खून की जांच में शुगर सामान्य स्तर पर तो है पर उसकी अंतिम सीमा पर है अगर इससे ज्यादा बढ़ी तो इनको दवाइयाँ लेनी पड़ेंगी|अच्छा होगा कि हम लोग चीनी, मैदा, घी-तेल से बनी, तली-भुनी चीजों का परहेज़ करे|”      
“हाँ हाँ परहेज़ करना हमेशा ही अच्छा होता है |”
“सोचती हूँ आपने जो लड्डू मठरी बनाए हैं आस – पड़ोस में थोड़े थोड़े दे आऊँ|मेरी पड़ोसिनें तो आपके हाथ के बने लड्डूओं की हमेशा याद करती हैं|फिर इनको भी सामने दिखेंगे तो एक बार में दो तीन लड्डू खा लेंगे, हाथ रूकेगा नहीं| अब नुकसान करेंगे|”
“शुद्ध घी में बनाए हैं ,ये नुक्सान नहीं करते हैं |”
“घी ती घी ही है ना |लड्डू में तो घी साथ में चीनी भी है |आप ही सोचिये दोनों की मिलाकर कितनी कैलोरीज़ बढ़ जायेंगी|”
“एक दो लड्डू खाने से कुछ ना होता है,उलटे ताकत ही रहती है शरीर में |”
“इनका वज़न भी बढ़ता जा रहा है पेट भी निकल रहा है ,बढ़ते मोटापे को अभी से ही रोकना चाहिए |”
“ये तो खाते पीते खानदान की निशानी है | ४० बरस के बाद तो सब लड़के थोड़े बहुत अच्छे हो ही जाते हैं | ठहराव आता है ज़िंदगी में |”
“अब आपको कैसे समझाऊं इनको खाने की चीजों के मामले में अपनी ज़बान पर नियंत्रण नहीं है इसलिये हम लोगों को ज्यादा ध्यान रखने की ज़रुरत है |” 
“वो तो शुरू से ही खाने का शौकीन रहा है| जितना ज्यादा टोकोगी उतनी ही और खाने की इच्छा होती है| फिर घर का बना है बाज़ार का थोड़े ही है| मां की ममता भी तो होती है ,कुछ बनाऊँ ,खिलाऊँ |”
“मांजी ये आपका कैसा लाड़ व ममता है कि आप अपने ही बेटे को वही चीजें खिलाना चाहती हैं जो उसे नुकसान पहुंचा रहीं हैं| मेरी बात तो जाने दीजीये कम से कम डॉक्टर की रिपोर्ट का तो सम्मान कीजीये|”
मनीषा सक्सेना
इलाहाबाद

                                     

Monday, 17 July 2017

लघुकथा ---बैड टच


बैड टच
कामकाजी बेटे बहु के पास आये हुए एक हफ्ता ही हुआ है |शनिवार इतवार तो सबकी छुट्टी होती है |हँसते-बोलते, खेलते-कूदते, घूमते-फिरते बीत जाता है पर बाकी दिन इंतज़ार   और सिर्फ इंतज़ार | सोमवार से शुक्रवार जब सुबह ५बजे से दिनचर्या शुरू होती तो पोती को देख कर कलेजा मुंह को आने लगता |इतनी छोटी बच्ची और पीठ पे इतना सामान जैसे लाम पर जा रही हो | पहले स्कूल फिर डे स्कूल| शाम ६बजे माता पिता के साथ लौटती |अनुशासित इतनी कि आते ही सारी चीज़े यथास्थान रखती |लाख कहो कि आजा दादी कपड़े बदलवा दें पर नहीं ,मम्मी के साथ कमरे में ही जाकर बदलती |
      आज मेरी बिट्टू ने क्या सीखा ?पूछते ही बस शुरू हो जाती “क्ले की फिश बनाई”
“ट्रेफिक लाईट का सिग्नल देखकर आगे बढ़ना चाहिए| रेड पर स्टॉप ,येलो पर वेट एंड सी ,ग्रीन पर गो |”जानवरों के बच्चों को क्या कहते हैं ,जानवरों की बोलियाँ उन सब की नक़ल उतारी|
“ दादी आप जब बीमार पड़ जाएँगी तो कहाँ जायेंगी ?”
“डॉक्टर को दिखाने”
“तो ये लीजिये आपकी पर्ची”  
“डॉक्टर अंकल के पास जाए तो पर्ची लेकर बाहर बैठे ,जब आपका नाम बुलाया जाए तब अन्दर जाना है |” “छोटे बच्चे मम्मी पापा के साथ अन्दर जाकर अपना चेककप कराएं| मम्मी पापा के सामने खाली डॉक्टर अंकल ही आपके चेस्ट एंड थाइज़ देख सकते हैं|बाकी कोई इनको टच नहीं कर सकता है |”सिर के साथ साथ तर्जनी को भी दायें बाएं हिला कर टीचर की नक़ल की |
“ये तो हम लोगों को भी नहीं बताया मम्मीजी ,आजकल सब स्कूल में सीखती है |”थोड़े गर्व से बहु ने बिटिया की तरफ देखा |
“फ्राइडे को ग्रेंड पेरेंट्स डे है | मैम हम लोगो को डांस सिखा रहीं हैं| दादी, मैम कह रहीं थी गॉड के ऊपर जो सुपर गॉड होते हैं वो ग्रेंड पेरेंट्स होते हैं |” “दादी आप नेक्स्ट वीक तक रुकेंगी न !सब बच्चों के ग्रेन्ड पेरेंट्स को टीचर ने बुलाया है |आप प्रोग्राम देखकर ही जाइएगा |”
          इतनी चटर पटर करने के बाद थोड़ी निंदासी होने लगी| “आज छोटी बच्ची दादी पास सोएगी”|उसने मां की तरफ देखा| “हाँ बेटा सो जाओ |दादी तुम्हें कहानी सुनाएंगी|” कहानी सुनाते हुए मैं उसके पैर हल्के से दबाने लगी|दबाते दबाते जैसे ही मेरा हाथ उसके घुटने से ऊपर की तरफ आया, उसने मेरा हाथ झटक दिया ..नो दिज़ इज बैड टच|
          मैं मन ही मन सोचने लगी ममता का गुड टच आजकल के ये बच्चे कैसे सीखेंगे और जानेंगे ?  
मनीषा सक्सेना
इलाहाबाद



                                    


Friday, 14 July 2017

लघुकथा ---मूं दर मूं


मूं दर मूं

मानव ने सालों मेहनत करके अपने जैसा रोबोट बनाया |मुंह बोला भाई कहा |जब भी मानव को ज़रूरत होती ,मुंह उठाये रोबोट के पास आता और मुंह का सच्चा रोबोट सारी  समस्यायें चुटकी में हल कर देता|
      मानव रोबोट का मुंह देखकर उठता,मुंह देखकर जीता,मुंह देखी बातें करता |खुदा न खास्ता रोबोट में कुछ खराबी आ जाए तो उसका मुंह बिगड़ने लगता ,समस्या हल न होने पर पाने की स्थिति में उसका मुंह सूखने लगता और नौबत मुंह छिपाने की आ जाती |इसके विपरीत रोबोट का मुंह खुलवाया जाता तो मुंह खोलता नहीं तो मुंह बाए पडा रहता |त्वरित इतना कि मानव अपना मुंह खोले उससे पहले ही मुंह की बात छीन ले |मुंह चलाते रोबोट कभी थकता नहीं और तो और मुंह की मुंह में रह जाने का गुण तो उसमें है ही नहीं ,इसी के कारण मानव मुंह की खाने लगा ,जो मुंह में आया बकने लगता |
         मानव की मानवीय कमजोरियां ज़ोर पकड़ने लगीं |मुंह चलाने से बाज नहीं आता |मुंह न चला पाता तो मुंह चिढ़ाने लगता| कभी मुंह देखी बात करता |मौक़ा पड़ने पर मुंह चाटने से बाज नहीं आता |खुश होता तो मुंह में घी शक्कर कहता |काम बन जाने पर मुंह मीठा कराता |
         रोबोट शांत रहता ,जानता है मानव का काम उसके बिना नहीं चलेगा |सब जगह से मुंह की खायेगा तब उसके मुंह के कौए उड़ने लगेंगे| तो  जायेंगा कहाँ?मुंह में दांत न पेट में आंत होगी तो मुंह उठा कर मेरी ही शरण में आएगा |

मनीषा सक्सेना
इलाहाबाद  





                                    


लघुकथा सुख की चाहत

                            
सुख की चाहत
रीना की शादी की बातचीत चल रही थी |घरवालों ने अच्छा घर वर ढूँढने के लिए   ऑनलाइन विज्ञापन निकाला |भाई के साथ रीना अपनी शादी के लिए साथी डॉट कॉम पर विज्ञापन देख रही थी |रीना को कोई वर पसंद ही नहीं आरहा था |प्रारम्भिक जानकारी देखने की बाद ही लाल बटन दबा कर ब्लॉक कर देती |भाई ने झींक कर पूछा “आखिर तुम चाहती क्या हो |” “भैया ज्यादातर लड़के मेरी नौकरी व तनख्वाह के बारे में पूछते हैं या फिर मेरे चेहरे मोहरे पर फ़िदा होते हैं |मैं कोई सुन्दर सी रूपया उगलने वाली मशीन नहीं बनाना चाहती हूँ |अपने घर में सुख शांति से रहना चाहती हूँ |इसकी कोई बात ही नहीं करता |” “तो मिल गया तुम्हे ...बैठो और ढूंढो ,” कहकर भाई उठ गया |
“मुझे जब कोई अच्छा लगेगा तब बता दूंगी |”
               एक विज्ञापन पर नज़र गयी जिसमें भावी वर ने लिखा था सरकारी नौकरी है,औसत तनखा है,खुशमिजाज़ जीवनसंगिनी चाहिए |आजकल की भेड़चाल से थोड़ा अलग सा लगा|हरा बटन देख कर बातचीत प्रारम्भ की ....
“हाय,मेरी प्रोफाइल आपने पढ़ ली हो तो बातचीत करे” “अपने बारे में बताइये”
“मैं बच्चों का डॉक्टर हूँ ,सरकारी नौकरी है ,बन्दा भी इलाहाबाद का ही है|” “आप” ?
“मैंने भी ग्रेजुएशन करके एम.बी.ए. फायनेंस प्रोफेशनल में किया है ,इलाहाबाद के ही एक बैंक में वित्तीय सलाहकार हूँ|”
“आप डॉक्टर होने के नाते दिनरात मरीज़ ही देखते होंगे”
“ओ.पी.डी. में लंच तक बच्चो को देखता हूँ लंच के बाद एम.बी.बी.एस के बच्चों को पढ़ाना होता है |
“शाम को फिर मरीज़ देखते होंगे ,विभिन्न नर्सिंग होम में जाना भी पड़ता होगा|”
“नहीं, शाम मैं अपने लिए रखता हूँ |पढ़ना, घूमना, बागवानी करना ,आदि आदि|”
“आपभी तो कुछ अपने बारे में बताइये|”
“अच्छा लगा जानकर कि डॉक्टर होने के बावजूद भी आप शाम को अपने लिए समय निकालते है |मैं भी बंधी बंधाई नौकरी करती हूँ बस ९ से ६ की |सुख शांति से रहना मुझे अच्छा लगता है |”
“अच्छा तो सुख शांति से रहने के लिए आप क्या करना चाहती हैं|”
“चाहती ही नहीं हूँ कर दिया है ,विदेशी बडे बैनर की कंपनी ,बड़ी तनख्वाह पर, कोल्हू का बैल न बनकर, परिवार के साथ रहना पसंद किया है|”   
प्रारम्भिक जानकारियों के आदान-प्रदान के बाद वे दोनों आपस में अपने विचार थोड़े खुल कर बताने लगे |
“मेरा मानना है की पत्नी अपनी मानसिक संतुष्टि के लिए काम तो करे पर घर व बच्चों के पालन पोषण को ज़रूर प्राथमिकता दे तभी परिवार सुखी रह सकता है |”
“मेरी भी सोच कुछ आपसे मिलती है ,पति-पत्नी साथ साथ एक शहर में रह कर ही काम करे तो जिन्दगी में शांति रहती है |दूरियां व पैसा थोड़ा कम हो, कोई दिक्कत नहीं पर चैन की जिंदगी हो, ये ज्यादा ज़रूरी है |”
“हरेक साधारण लड़की की तरह खाना बनाने व खिलाने का शौक है,विशेषकर त्योहारों को मनाना ,मन में स्फूर्ति भरता है |”
“आप साधारण नहीं असाधारण है आजके ज़माने में आप जैसे विचारों वाली लड़की  विरले ही मिलती है | मुझे लगता है हम लोग अच्छे दोस्त हो सकते है |”
“मुझे भी अच्छा लगा आप जैसे दोस्त से बात करके|”
“आपको एक मज़े की बात बताऊँ,ग्रेजुएशन करते समय मेरे दोस्त मुझे कहते थे- तू तो हमेशा (MBBS) मियाँ बीबी बच्चों सहित ही रहेगा|”
“मेरी सहेलियां कहती है तेरा कुछ नहीं हो सकता- MBA (FP)मियाँ बीबी और फेमिली पूर्ण”     
मनीषा सक्सेना
इलाहाबाद







Thursday, 13 July 2017

लघुकथा -----भंवर

भंवर

चलचित्र की भांति शांति की बातें रह रह कर दिमाग में घूम रहीं थीं इतनी सुन्दर व भोली लड़की अपनी दुर्बलताओं के कारण भंवर में फंसती चली गयी|नौकरी छोड़ने से पहले एक के बाद एक धमाके कर रही थी |इतनी सुघड़ता से काम करने वाली खुशमिजाज़ लड़की प्यार के भंवर  में फंस गई |साल भर से उसकी कोई खबर नहीं ,
पता नहीं किस हाल में है -----

                         “शांति ने आज फिर इतनी देर लगा दी ,झाडू –बर्तन सब पड़ा है |पता नहीं क्या करती रहती है आजकल ,ज़रूर फोन पर बतिया रही होगी |सारी बातें इसे फोन पर ही कर लेनी होती हैं ,ये फोन ही इस लड़की को ले डूबेगा|”
 “आंटी ..आंटी”
“बातें बाद में ,पहले जल्दी से कुकर ,कढाई धो दे ,दाल सब्जी बनानी है “
तभी उसके फोन की घंटी बजने लगी |वह फुर्ती से बरामदे में चली गई |पंद्रह मिनिट बाद आई ,हँसते हुये कहती है “कृष्णा को तो ज़रा जरा सी बात पर फोन करके बात करनी होती है |मैं जो कहूं वही करता है ,जो खाना चाहूँ वही ले देता है |
“करता क्या है”
“ओला कंपनी में ड्राइवर है”
“पढ़ा लिखा है या तुम्हारी तरह बस साईन भर करना जानता है”
“आंटी बड़े घर का है ,इंटर पास है |काला है तो क्या मैं तो गोरी हूँ ना !”
“मौहल्ले में सब उससे डरते हैं दादा टाइप है न ,पुलिस वालों से भी दोस्ती है उसकी |
कहता है जबसे मुझसे दोस्ती हुई है किसी और लड़की की तरफ उसका देखने का मन ही नहीं करता है |शादी के बाद मुझसे काम भी नहीं करवाएगा |”
“पिछली बार आंटी ३०० रू. आपसे ले गई थी ना जन्मदिन की टीशर्ट दी थी तो देखा
उसकी पीठ पर दागा हुआ नंबर है ,कहरहा था बैंक में चोरी करते समय कैमरे में फोटो आ गई,इसलिये पुलिस ने पकड़ लिया ,हर महीने हाजिर होना पड़ता है पर अब वो सुधर रहा है ,केस भी जल्दी सुलट जाएगा|  
“हमलोगों ने मंदिर में शादी कर ली है , मां बाप राज़ी नहीं हैं ,कमरा किराए पर लेकर रहेंगे |सास ननद का लफड़ा भी नहीं रहेगा |”
“कोर्ट में की गयी शादी वैध मानी जाती है मंदिर की नहीं”
“हाँ आंटी ,और भी लोग ये बात कह रहे थे ,कृष्णा कहता है उसकी बहिन की शादी हो जाए फिर हमलोग कोर्ट में भी शादी कर लेंगे |”
“आंटी महीना नहीं हुआ तो बच्चा ठहर जाता है क्या ?”
“सरकारी अस्पताल में दिखा दो,जांच में पता लग जाएगा|”
“आंटी बच्चा अभी नहीं चाहिए ,कैसे पालेंगे ?कल कृष्णा की नौकरी छूट गयी है| ग्राहक ने शिकायत कर दी ,शराब पीकर गाड़ी चला रहा था |कहता है बच्चा ठहर गया तो गिरा देंगे |पड़ोस वाली भाभी कह रही थी अगर ४ महीने हो गए हैं बच्चा गिरा नहीं सकते हैं| उनको अस्पताल में आया टाईप की औरत मिली थी कह रही थी कोई बच्चा ना चाहे तो   हमको दे देना हम पाल लेंगे |दस हज़ार रु, तुमको दे देंगे |मैंने भी कह दिया लड़का होगा तो घरवाले हमलोगों को रख लेंगे| लड़का हो या लड़की ,बच्चा तो अपना ही है न ,किसी को क्यों दें ,हैं ना आंटी |”
          शांति दिखाई नहीं पड़ी मौहल्ले में चर्चा थी की वह मीरगंज की गली में कमरा लेकर रह रही है ,उसके लड़की हुई है |     

Wednesday, 12 July 2017

लघुकथा -----शुरूवात

   
शुरूवात

     “भाभी जल्दी आइये देखिये ‘साथी डॉट कॉम’ पर कितने उत्तर आये हैं|”
“अरे क्या करती हैं बड़े लोग देखेंगे,सुनेंगे तो क्या सोचेंगे |”
“खुश होंगे भाभी, सब चाहते हैं कि आप फिर से एक नई ज़िंदगी की शुरुआत करें |”
“सालों पहले मुझे सफ़ेद साड़ी से रंगीन साडी पहनाने में, कितने पापड़ बेले थे आपने, भूल गयी क्या, जो अब ये नया काम करने जा रही हैं |”  
“पर मैं सफल हुई ना|थोड़ा सा आत्मविश्वास की ज़रूरत है बस |केदारनाथ के हादसे को हुए भी १२ साल बीत गए हैं ,भाई व बच्चों को तो वापिस नहीं ला सकती पर आप दूसरों को तो सहारा दे सकती हैं|”
“नहीं नहीं बस अब मैं और मेरा काम, ज़िन्दगी आराम से बड़ों की छत्रछाया में निकाल लूंगी |”
“आप पापा मम्मी के सफ़ेद पड़ते हुए चेहरों को नहीं देख रही हैं| वे लोग भी कितने दिन के हैं आखिर? आपके लिए अच्छा सा घर चुनकर वे भी सुकून में रहेंगे|”
“पिछले एक दशक में मेरे बाल भी काले से सफ़ेद हो गए है अब मुझे कोई डर नहीं रह गया है |”
“यही तो मैं कह रही हूँ बिना डरे, बिना रुके, नई ज़िन्दगी की शुरूवात कीजीये| बालों की सफेदी आपको और आपके व्यक्तित्व को और भी गरिमामय बना रही है |आप जैसे और भी अच्छे लोग हैं, बात तो कीजीये ,राहें अपनेआप खुलती जायेंगी|”
“आपको लगता है कि इतने समय के बाद इस दिशा में बढ़ना आसान है क्या?बड़ी मुश्किल से तो इस जिन्दगी से सामंजस्य बैठा पाई हूँ और आप कह रहीं हैं कि फिर नए सिरे से शुरूवात करो, वो भी अनजानों से |मेरी छोडिये ,मम्मी पापा के बारे में सोचिये मेरा मुंह देखकर ही, वे जी रहे हैं |सच पूछिए तो उनका सहारा न होता तो मैं अपने पैरों पर खडी भी ना हो पाती |नई शुरूवात करना चाहती हूँ ,ये तो मैं शायद पूछ ही ना पाऊं|”
“जैसे  पूछने की झिझक आपको है वैसे ही बताने की झिझक उनको भी है| आपको बस कदम बढ़ाने की आवश्यकता है |जिम्मेदारियों से वे कभी पीछे नहीं हटे है|” “कोई जल्दी नहीं है आराम से मेरी बात पर गौर करिए ,बातचीत करिए| नई पारी की शुरूवात करने की सोचिये तो सही ,सब आपके साथ हैं|”
“ये छोटी- मोटी बात नहीं है अपने और पराये दोनों तरफ के लोगों की जिन्दगियों का सवाल है|”   
“अपने तो अपने हैं ही और परायों को अपनाना व अपना बनाना आपको बहुत अच्छी तरह आता है|इसमें आप जरूर सफलता पाएगी ये मैं दावे के साथ कह सकती हूँ |पिछले एक दशक में खाली मन ही है जो नहीं बदला है| सूचना प्रचार प्रसार तंत्र ,नई तकनीक,बड़े बूढों का अनुभव व पारखी आँखें,सब कुछ तो है आपके पास ,सबका संयोजन करके आगे बढ़ने की आवश्यकता है| फिर मैं तो हूँ ही |      
      कहकर व सुनकर ननद भाभी दोनों की आँखें भर आई |

मनीषा सक्सेना
इलाहाबाद



Thursday, 6 July 2017

मम्मी के जन्मदिन पर ख़ास

                                                        मम्मी का जन्मदिन
मम्मी का जन्मदिन हम लोग ७ जुलाई को मनाते आये हैं |इस दिन मेरे ताउजी यानी मम्मी के जेठ, व मेरी बेटी यानि की मम्मी की नातिन का जन्मदिन भी होता है |अतः मैंने जबसे होश सम्भाला है तबसे हम सब मम्मी का जन्मदिन ७ जुलाई को ही मनाते आए हैं |
                                            पिछले दिनों बैंक में अकाउंट खुलवाते वक्त मम्मी का बर्थ सर्टिफिकेट चाहिए था तो हाईस्कूल का सर्टिफिकेट मैंने निकाला तो देखा उसमें जन्म की तारीख ६ जुलाई लिखी है |मुझे बड़ा अचरज हुआ ,मम्मी से पूछा तो बोली "हाँ सर्टिफिकेट में तो ६ ही लिखी है |""तुम्हारा जन्मदिन ६ को है या ७ को?""अरे बेटा पता नहीं, छोटे थे तो जन्मदिन मनाया ही नहीं गया|शादी होकर आये तो भाईसाहब के साथ सब मनाने लगे |इंदौर में मंजू मेरी सहेली की भी ७ को ही होती थी तो साथ साथ मनाते थे ,फिर एषा मेरी नातिन ७ को हुई तो अब उसके साथ मनने लगी |"वाह !मेरी मां |धन्य हो तुम |जीवन के विभिन्न पडावों में सबका साथ निभाती जा रही हो |"अच्छा एक बात बताओ तुम्हारा मन नहीं किया की यदि तुम्हारा जन्मदिन ६ को है तो ६ को ही मने |"मम्मी बड़े मुस्कुरा कर बोली" क्या फर्क पड़ता है ६ को मनाया या ७ को ,सबका साथ ज्यादा ज़रूरी है---सब एक जगह इकठ्ठे हों हँसे- बोले ,खायें  पीयें ,मस्ती करें और क्या चाहिए |"पापा इतनी देर से चुपचाप बैठे हैं  आप बोलते क्यों नहीं |"भाई मुझे याद है शादी में जब जन्मपत्री आई थी तो उसमें ७जुलाई लिखा था ,हाईस्कूल में ना जाने कैसे ६ जुलाई लिख गया है |जन्मपत्री में जो लिखा है मेरे हिसाब से वो सही होना चाहिए|बारहाल जो हो अपने को तो दोनों दिन पार्टी मिल जायेगी |"वे चितपरिचित अंदाज़ में हंसने लगे |
                                               सच में मम्मी तुम्हारे विचार बहुत ऊंचे हैं ,जो कहती हो वो जिन्दगी में उतारती भी हो और इसीलिए तुम ख़ास हो ----------तुम्हारे जन्मदिन पर ये कार्ड मैंने बनाया है -----सादर समर्पित -----



जन्मदिन की बहुत सारी  शुभकामनाये 
मनीषा