सच्चा मित्र
“मेरा हाथ छुड़ा के मत जाओ”
“मैं कहाँ जा रहा हूँ मैं तो तुम्हें और हरा भरा करके सम्पन्न कर रहा
हूँ| फ़ालतू व अनुपयोगी बड़े पेड़ों को हटा करा अपने मानव साथियों के लिए जगह बना रहा
हूँ |”
“मत करो मित्र इसके कारण प्राकृतिक संतुलन बिगड रहा है| प्राकृतिक
आपदाएंजैसे सुनामी, बाढ़ ,भूकंप,सूखे की मार झेलकर भी तुमने सबक नहीं लिया |”
“मुसीबतों से निबट लूंगा|”
“खेती लायक जमीन ही नहीं बचेगी तो क्या करोगे?”
“मैंने थोड़े से संसाधनों से ही हरित क्रान्ति ,श्वेत व नीली क्रान्ति
करके भरपूर पैदावार कर ली है| नए अनुसंधान के तहत टिशु कल्चर सेबिना बीज की सहायता
से हज़ारों फल व फूल के पौधे तैयार कर लिए हैं, जो छोटे में ही ढेरों देते हैं |इतना
ही नहीं जींस में थोड़ा सा परिवर्तन करके प्रतिकूल मौसम में भी सब्जी व फल का मज़ा
लेते हैं|जैसे साल भर मिलने वाला छोटा तरबूज़, चेरी टमाटर,बिना बीज का अंगूर आदि |”
“तुम्हें पता है जो प्रक्रिया सैकड़ों वर्षों में पूर्ण होती उसे तुमने
एक झटके में करने की कोशिश की है ,प्रकृति में सहजीवन की धुरी हैं हम दोनों |इसका पता तुम्हें ढाई हज़ार साल बाद पता चलेगा जब जींस
में परिवर्तित सब्ज़ी फल का उपभोग आने वाली पीढी करेगी और तुम्हारी नस्ल भी इससे
प्रभावित होगी |अभी भी समय है दोस्त मेरा साथ मत छोड़ना| ऑर्गनिकखेती अपनाओ |आने
वाली पीढ़ी हमें दुआ देगी |
मनीषा सक्सेना
इलाहाबाद
आर्गेनिक खेती के सही समर्थन कादृष्टिकोण बताती अच्छी लघुकथा।
ReplyDelete