Thursday, 20 July 2017

लघुकथा -------खोट



                                खोट
       देर से ही सही तीस साल की उम्र में आज लड़की की सगाई हो गयी| लड़का  बड़ी कंपनी में मैंनेजर के पद पर है| घर के अन्य लोग भी पढेलिखे सुसंस्कृत हैं| कोई मांग नहीं| उलटे खुद ही बेटी को इतना गहना कपड़ा चढ़ा गये| फल मिठाई भी भर भर कर लाए थे|मां कभी लड़की के भाग्य को सराह्ती तो कभी घुमा फिरा कर लड़के और उसके घर वालों से पूछती शादी में उनकी तरफ से कोई मांग हो तो वे निसंकोच बतायें| लड़के की मां बडी शालीनता से कहती इतनी पढ़ी लिखी अच्छे संस्कार वाली बेटी हमें मिल रही है और हमें कुछ नहीं चाहिये| बेटी की माँ दिल ही दिल में सोचने लगी शादी में अभी छ: महिने की देर है तब तक तो कुछ पता चल जायेगा| शादी का जब महिना भर ही रह गया और लड़के वालों के यहां से कोई मांग नहीं आई तो उसके मन में शंका आई...कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं, ये लोग कोई मांग नहीं कर रहें हैं| रहा नहीं गया तो पेपर पढ़ रहे पति से पूछा ---“सुनो जी, लड़के वालों ने अभी तक कुछ माँगा नहीं| मुझे तो बड़ी घबराहट हो रही है| कहीं ऐन वक्त पर अपना मुंह न खोल दें तब हम कैसे इंतजाम करेंगे? मैंने तो साफ़ तौर पूछा भी था दहेज़ में घर के सामान तो देंगे इसके अलावा हम और बड़ी चीजें कार वगैरह-----तो जल्दी से उन्होंने मेरे हाथ पकड़ लिए और कहने लगी हमारे पास भगवान का दिया सब कुछ है,बस एक प्यारी सी बहु ही चाहिए |”  
“तुम तो बेकार ही घबरा रही हो कुछ होता तो अपनी बेटी इशारा कर देती रोज़ ही तो उसकी लड़के से बातचीत हो रही है|”
“मेरी जानकारी में ये जो बच्चे कम्पूटर पर बातचीत करके शादी कर लेते हैं उनकी शादी ज्यादा दिन टिकती नहीं है|अपनी बेटी ज्यादा बाहर आई गई भी नहीं है |”
“आजकल के बच्चे पढ़े लिखे और अकलमंद होते हैं,अपना भला बुरा खूब समझते हैं|”  
“बेटी को ये अक्ल कहाँ? समझदार होती तो ३० साल की उम्र तक शादी के लिए बैठी ना होती |पता नहीं लड़का उसको क्या पट्टी पढ़ा रहा है |”
“लड़का क्या कहेगा? तुमने देखा नहीं सगाई के समय अपनी बेटी सबसे कैसे हिलमिल कर बात कर रही थी |कंपनी में मेनेजर वो भी है|रोज़ इतने लोगों के संपर्क में आती है , लोगों को अच्छे से समझती है |”
“ख़ाक समझदार है| कम्पनी में हरेक का काम करती रहती है |देखा नहीं सगाई के समय उसकी सास कैसी मीठी मीठी बातें कर रहीं थीं |जो ज्यादा मीठा बोलता है न उसके मन में कुछ और ही होता है |मेरा मन बहुत घबरा रहा है, ज़रूर कुछ घटने वाला है| कल रात को कुत्ता भी रो रहा था,सुबह से चीजें भी हाथ से छूट रहीं हैं |”
“अच्छा बताओ क्या हो सकता है, शादी की जगह- हमारी पसंद की ,खाने का खर्चा- हमदोनों पार्टी का आधा आधा ,पढ़े लिखे सुसंस्कृत लोग,सबसे बड़ी बात आजकल हमारी बेटी खुश रहती है और हमें क्या चाहिये |
“मुझे तो लगता है ज़रूर लड़के में ही कुछ खोट है जो उसके घरवाले हर बात मानते जा रहे हैं|”
“खोट लड़के में नहीं तुम्हारी पुराणपंथी विचारधारा में है इन्हीं सब बेकार की बातों में उलझ कर आज तक हम बेटी का रिश्ता कहीं भी पक्का नहीं कर पाए|”
मनीषा सक्सेना
इलाहाबाद  





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