Friday, 14 July 2017

लघुकथा ---मूं दर मूं


मूं दर मूं

मानव ने सालों मेहनत करके अपने जैसा रोबोट बनाया |मुंह बोला भाई कहा |जब भी मानव को ज़रूरत होती ,मुंह उठाये रोबोट के पास आता और मुंह का सच्चा रोबोट सारी  समस्यायें चुटकी में हल कर देता|
      मानव रोबोट का मुंह देखकर उठता,मुंह देखकर जीता,मुंह देखी बातें करता |खुदा न खास्ता रोबोट में कुछ खराबी आ जाए तो उसका मुंह बिगड़ने लगता ,समस्या हल न होने पर पाने की स्थिति में उसका मुंह सूखने लगता और नौबत मुंह छिपाने की आ जाती |इसके विपरीत रोबोट का मुंह खुलवाया जाता तो मुंह खोलता नहीं तो मुंह बाए पडा रहता |त्वरित इतना कि मानव अपना मुंह खोले उससे पहले ही मुंह की बात छीन ले |मुंह चलाते रोबोट कभी थकता नहीं और तो और मुंह की मुंह में रह जाने का गुण तो उसमें है ही नहीं ,इसी के कारण मानव मुंह की खाने लगा ,जो मुंह में आया बकने लगता |
         मानव की मानवीय कमजोरियां ज़ोर पकड़ने लगीं |मुंह चलाने से बाज नहीं आता |मुंह न चला पाता तो मुंह चिढ़ाने लगता| कभी मुंह देखी बात करता |मौक़ा पड़ने पर मुंह चाटने से बाज नहीं आता |खुश होता तो मुंह में घी शक्कर कहता |काम बन जाने पर मुंह मीठा कराता |
         रोबोट शांत रहता ,जानता है मानव का काम उसके बिना नहीं चलेगा |सब जगह से मुंह की खायेगा तब उसके मुंह के कौए उड़ने लगेंगे| तो  जायेंगा कहाँ?मुंह में दांत न पेट में आंत होगी तो मुंह उठा कर मेरी ही शरण में आएगा |

मनीषा सक्सेना
इलाहाबाद  





                                    


5 comments: