Saturday, 22 July 2017

लघुकथा ---आधार

आधार                  

          एक जानीमानी कंपनी में भर्ती चल रही थी| लिखित परीक्षा में पास होकर परीक्षार्थी इंटरव्यू देने आये थे|कंपनी के मालिक ने मैनेजर सहित तीन सदस्यीय कमेटी को हिदायत दी कि कम्पनी को ईमानदार, लगनशील, काम जाननेवाले, मेहनती ग्रेजुएट इंजीनीयर्स की आवश्यकता है| सदस्यों ने तीन सौ अभ्यर्थियों के नाम चुनकर कंपनी के मालिक को दिये| मालिक ने सबको बुलाया| सबके नंबर देखे, बातचीत की| तीन सौ में से २०० बच्चों का चुनाव किया गया | इन बच्चों में ८० प्रतिशत बच्चे सीधे से और कम नंबर वाले थे |
            कमेटी ने कौतुहल से मालिक से चुनाव का कारण पूछा| वे मुस्कुराये और बोलेकम प्राप्तांक वाले वे बच्चे हैं जो पढ़ाई की दृष्टि से, मेरिट में अव्वल हैं, पूरे देश की मेरिट के नंबर के आधार पर विभिन्न राज्यों के सरकारी कॉलेजों में इन्हें दाखिला मिलता हैं |”
“सरकारी कॉलेज में पढ़ाई कहाँ होती है सर? संसाधन तक तो जुटा नहीं पाते हैं|”
“सरकारी कॉलेज के अध्यापक खुद भी पी एच डी होते हैं और पूरे सत्र पढ़ाते हैं, हाँ कॉलेज में संसाधन कम हो सकते हैं पर इनमें पढने वालों का दिमाग तेज़ होता है |एक बात और, ज्यादातर बच्चे मध्यमवर्गीय परिवार से होने के नाते इनमें कुछ कर गुजरने  की इच्छा होती हैं|”
“और बाकी २० प्रतिशत सर?”
“सेल्स व मार्किटिंग के लिए स्मार्ट बन्दे चाहिए| ये तकनीकि काम थोड़ा कम जानते हैं| इनकी वफादारी पैसे से होती है| जहां ज्यादा पैसा मिलता है, उसी कंपनी की हो जाते हैं |
“पर ऐसे बच्चों की ज़रूरत क्यों है ,सर?”
“ये हाव –भाव से व बातों से ग्राहकों को अच्छा फंसा लेते हैं |इनकी ख़ास बात है--
व्यवहार कुशलता व लक्ष्य पर निगाह| कंपनी में ये लोग ज्यादा टिकते नहीं हैं पर काम के होते हैं |   
               चुने गये ८० प्रतिशत बच्चों में ज्यादतर सरकारी कॉलेजों के बच्चे थे जो कम्पनी के आधार हैं और ये देश को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं और बाकी मैनेजर की तरह प्राइवेट कॉलेज के थे|
मनीषा सक्सेना

इलाहाबाद 

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