Monday, 9 September 2019

समय का बद्लाव और हिंदी



समय का बदलाव और हिंदी
         हर साल हिंदी दिवस, हिन्दी सप्ताह, हिन्दी पखवाड़ा सितम्बर के महीने में मनाया जाता है| ओजस्वी भाषणों, कविता वाचनों, और विभिन्न हिंदी साहित्य के पुरुस्कार समारोह के आयोजनों में जो धनराशि खर्च की जाती है उसका काम ऐसा ही है जैसे बच्चे का जन्मदिन मनाना|  जितना बड़ा प्रतिष्ठान उतना ही भव्य आयोजन|
राष्ट्रभाषा ज़रूरी क्यों --------
       मनुष्य अपने विचारों की अभिव्यक्ति किसी न किसी भाषा के माध्यम से करता है|  भाषा से ही सामाजिक परिवेश बनता है, सांस्कृतिक उत्थान होता है और तभी राष्ट्र की प्रगति होती है|  साहित्य, कला, विज्ञान, इतिहास, संगीत सबका आधार भाषा ही है|
      सितम्बर १९५० में गांधीजी की उस पीढी ने हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दे दिया था|  वह पीढी यह सोचती थी कि कोई भी मुल्क भाषा के अभाव में स्वाधीन नहीं बना रह सकता है|  भाषा की अहमियत समझाने की कोशिश रूस ने की थी|  भारतीय राजनायिक ने अपना कार्यभार ग्रहणपत्र अंग्रेजी में दिया था तो वहां की सरकार ने लेने से मना कर दिया और कहा कि अंग्रेजी गुलाम भारत की भाषा थी और अंग्रेजी में पत्र प्रस्तुत करना गुलामी का प्रतीक है, गुलाम देश के साथ अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध स्थापित करने का कोई औचित्य नहीं बनता है|
          भाषा का संस्कृति से गहरा सम्बन्ध है, संस्कृति शरीर है तो भाषा उसका प्राणतत्व| १९६८ में राजभाषा संकल्प के अंतर्गत त्रिभाषा फॉर्मूला बनाया गया -१ हिन्दी २.अंग्रेजी ३.कोई भी भारतीय भाषा|  स्पष्ट था कि उत्तरवासी, दक्षिण की कोई भाषा पढ़े तथा दक्षिणवासी उत्तर की|  ऐसा हो ना सका| राजभाषा नियमों व उपनियमों के चक्रव्यूह में फंस कर रह गयी|
           साठ व सत्तर के दशक में नारे तो बहुत आये –“अंग्रेजी में काम ना होगा फिर से देश गुलाम न होगा”, “अँगरेज़ यहाँ से चले गए अंग्रेजी हमें हटानी हैपर कुछ नौकरशाही व कुछ राजनीतिज्ञों की दृढ इच्छाशक्ति के अभाव में ये नारे खाली नारे ही रह गए|  रही सही कसर नब्बे के दशक से शुरू हुई उदारीकरण की आर्थिक नीति ने कर दी| जिससे बहुराष्ट्रीय निगमों का प्रवेश होने लगा और अंग्रेजी के थोड़े बहुत उखड़ते पाँव और जमने लगे|
            यहीं से हिंदी का अनादर करना शुरू हुआ| हिंदी को हिंगलिश में परिवर्तित करने की कोशिश की जाने लगी| पूरे देश में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की बाढ़ आ गयी|  इन स्कूलों के पाठ्यक्रमों में हिंदी (जो हमारी मातृभाषा है)  का प्रवेश दूसरी कक्षा से प्रारम्भ किया जाने लगा| यह सर्वमान्य मत है कि बच्चों को प्रारम्भिक शिक्षा मातृभाषाओं में ही दी जानी चाहिए| हम मध्यम वर्ग वाले भी कहने लगे कि हिंदी तो हमारी मातृभाषा है जो देर सवेर आ ही जायेगी| अंग्रेजी जरूर आनी चाहिए क्योंकि वह कार्यक्षेत्र की भाषा है| आज आवश्यकता इस बात की है कि प्रारम्भिक कक्षाओं में पहले हिंदी का अक्षर ज्ञान कराया जाए और बाद में अंग्रेजी का| अंग्रेजी तो वो सीखेगा ही, हिंदी सिखानी ज़रूरी है| हिंदी ना आने का मतलब है बच्चा भारतीय समाज व संस्कृति से अलग हो गया| आजकल के अधिकाँश बच्चे हिंदी की गिनती नहीं जानते क्योंकि यह अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाई नहीं जाती| यदि उनसे अड़सठ रूपए देने को कहा जाए तो वे मुंह बाए देखते रहेंगे| दुकानवाला हिंदी में मोबाइल नंबर बोले तो वे उनकी समझ से बाहर होता है| 
          इस दौर में पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन, उद्योग व्यापार की तरह शुद्ध लाभ हानि की कसौटी पर होने लगा| न्यूज़ चैनल अपनी रेटिंग और अखबार अपने विज्ञापन बढाने को प्राथमिकता देने लगे|
          हिन्दी के अखबारों में हिन्दी के मूल शब्दों को हटा कर अंग्रेजी के शब्द छापे जाने लगे---- जैसे माता पिता की जगह पेरेंट्स, रविवार की बजाय सन्डे, यातायात की बजाय ट्रेफिक यानी कि हिन्दी के शब्दों को धीरे धीरे बोलचाल की भाषा से उखाड़ने का काम| उदाहरण के लिए इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में वेस्टर्न डांस की क्लासेस शुरू”| इस तरह से कोशिश ये रही हुई कि धीरे धीरे इन अंग्रेजी शब्दों को इतना बढ़ा दिया जाए की मूल भाषा हिंदी कारक भर रह जाए| इसी तरह आप एफ़एम. रेडियो पर रेडियो मिर्चीसुनिए तो समझ में ही नहीं आता है कि ये कौनसी भाषा है| उदाहरण के लिए---मॉर्निंग आवर्स के हेवी ट्रेफिक को देखते हुए, डिस्ट्रिक्ट एडमिनिसट्रेशन ने बहुत ही जनुऐन एफर्ट्स किये हैं पर इससे यूनिवर्सिटी रोड पर भीड़ बढती जा रही है, आप आनंद भवन के सामने से लेफ्ट टर्न मारो और फ़टाफ़ट पहुँचो|” ऐसे ही हिंदी कॉमेंट्री में अंग्रेजी के वाक्यांश सुने तो जाते ही हैं और अब अखबारों में भी लिखे जाने लगे हैं| जैसे----नो डाउट, आउट ऑफ रीच इत्यादि| इस तरह की भाषा पांच दस साल सुनी और पढी जायेगी तो आजकल का युवा भ्रमित हो जाएगा और बच्चे एक वाक्य भी हिंदी में बोल नहीं पायेंगे| समझ के अभाव में आम जनता भी भाषा परिवर्तन की इस प्रक्रिया को ऐतिहासिक प्रक्रिया मानने लगी है| इस प्रकार हिंदी की बजाय हिंगलिश को बढ़ावा मिला|  
इसके कारण क्या हैं ?
          हम भारतीय अभी भी अंग्रेजी की मानसिक गुलामी से ग्रसित हैं| अंग्रेजी वस्तुएं श्रेष्ठ हैं, अंग्रेजी नाम फैशनेबल हैं यही मानते हैं| भारतीय उद्धोगपत्तियो ने अपने संस्थानों के नाम अंग्रेजी में रखे हैं जैसे रिलाइन्स, पीटर इंग्लेंड, मोंटी कार्लो, एलेन सौली|बिजली की कम्पनी हवेलीराम ने हेवल्स नाम रखा| मसालों के नाम--- महाशय दी हट्टी की बजाय एम डी एच रखना ज्यादा पसंद किया है| यही नहीं कृषि में उर्वरकों के नाम व उनकी प्रयोग करने की विधि भी अक्सर अंग्रेजी में लिखी जाती है| माना जाता है कि साइनबोर्ड अंग्रेजी में होंगे तो बिक्री अच्छी होगी|
          कोर्ट कचहरी में ६० ७० साल पहले उर्दू में दस्तावेज तैयार  होते थे और अंग्रेजी में फैसले लिखे जाते थे| आश्चर्य की बात है कि आज भी केवल मध्यप्रदेश को छोड़कर सभी राज्यों में फैसले अंग्रेजी में ही लिखे जाते हैं यहाँ तक कि हिंदी भाषी राज्य उत्तरप्रदेश में भी| उ.प्र.में प्रेमशंकर गुप्त ही ऐसे जज थे जिन्होंने हिंदी में फैसले सुनाए थे|
             मातृभाषा के मोह ने हिंदी की व्यापकता पर चोट की| दक्षिण की भाषाओं ने हिंदी को नुकसान तो पहुंचाया ही, उत्तर की क्षेत्रीय भाषाओं के प्रति भी मोह पनपने लगा| आज जिसे हम हिंदी कहते हैं वह विभिन्न बोलियों के समावेश से ही बनी है| भोजपुरी, मैथिली, अवधि, बृज, मगही, अंगिका, जैसी बोलियों की साहित्यिक परंपरा व मिठास से ही खड़ीबोली बनी है| यही खड़ीबोली मानकीत होकर आज एक समृद्ध भाषा हिंदी के रूप में प्रतिष्ठित है| अतः उत्तर के हर क्षेत्र की बोली हिन्दी से क्यों अलग हो जाए? सूरदास,तुलसीदास, कबीर के बिना, हिंदी साहित्य की कल्पना आप कर सकते हैं? खड़ीबोली में फ्रेंच, पुर्तगाली, अरबी, फ़ारसी, संस्कृत, अंग्रेजी के शब्द भी आसानी से समावेशित होने के कारण, हिंदी विश्व की उन्नत भाषाओं के बीच खड़ी है|
अंग्रेजी के पक्षधर कहते हैं कि ज्ञान-विज्ञान की किताबों का हिन्दी में रूपान्तरण नहीं हो सकता| यह ठीक नहीं है| इसके साथ ही सरकारी प्रयासों से जो अनुवाद पुस्तकें सामने आईं उनमें विदेशी लेखकों की भरमार थी| हमारी मौलिकता तो विलुप्त हुई ही साथ ही राष्ट्रीय विचारधारा के लेखक जैसे जयशंकर प्रसाद, दिनकर, मैथिलीशरण गुप्त भी हाशिये पर आ गए |     
अब हिंदी का रुतबा बढ़ा है ----------
२०१० तक जब तक यूनीकोड कम्पूटर पर नहीं आई थी, हिन्दी की वर्तिनी हिंदी सुषा, सुषमा आदि अलग अलग थीं अतः हम इस क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ पा रहे थे| यूनीकोड के आने के बाद हिंदी के प्रचार प्रसार में व्यापकता आई| यह अधिक सहज और सरल हुई इसलिए आज अंतरजाल पर हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाएं प्रस्तुत हैं इसके अलावा लेखकों के अलग अलग ब्लॉग्स तो हैं ही|
गूगल ने फेसबुक, क्वोरा, व्हाटसेप के ज़रिये भारतीय भाषाओं को नई जीवन रेखा दी है| ऑनलाइन पुस्तकालय किनडल ने बहुत ही सस्ते दामों पर हिंदी की किताबें उपलब्ध कराई हैं इससे लोगों में हिंदी पढने लिखने में फिर से रूचि जाग्रत हुई है| 
भारत के नेता या राष्ट्राध्यक्ष विदेश जाते हैं तो वे हिंदी जानते हुए भी अंग्रेजी में बोलत्ते है-- पर क्यों? वहां पर दुभाषिये भी होते हैं| आज हमारे प्रधानमंत्रीजी ने हिंदी में बोलकर देश का गौरव बढाया है चाहे वह अमेरिका का मेंन्स स्कुवायर हो या जापान या फिर कोई मुस्लिम राष्ट्र| प्रधानमंत्रीजी समझते हैं कि हिंदी हमारी भावनाओं से जुड़ी हुई है साथ ही उनकी राजनैतिक इच्छाशक्ति भी जबरदस्त है| जब हमारे प्रधानमन्त्री बोलते हैं तो इसका सीधा सीधा असर मंत्री मंडल, कैबिनेट सचिव, राज्यस्तरीय सचिव, राज्यपालों व विदेश सेवा से जुड़े लोगों पर होता है| मोदीजी ने केन्द्रीय सचिवालय में हिंदी का प्रयोग अनिवार्य कर दिया है| इसका विरोध तमिलनाडू ने किया पर विरोध साथ के दशक जैसा नहीं था| कुछ नारे भी ऐसे दिए ताकि दक्षिणी राज्यों को हिंदी थोपी हुई ना लगे| जैसे ----स्वच्छ भारत सुन्दर भारत”, “सबका साथ सबका विकास”|
           दुरूह शब्दों से भरी हिंदी कभी जनता को स्वीकार्य नहीं हुई| आज़ादी के फ़ौरन बाद बने पारिभाषिक शब्द या आकाशवाणी  के समाचार में प्रयुक्त भाषा के रूप में ये हिंदी, हिंदी के प्रति अरूचि पैदा करती थी| लोग इनका प्रयोग लतीफे गढ़ने में करते थे| जैसे ---हमारे द्विचक्र वाहिनी के अग्र चक्र की वायु निष्कासित हो गयी है| कृपया अपने वायु ठूसक यन्त्र दुवारा अग्र चक्र में वायु अग्रेषित करने की कृपा करे| फिल्म के पुरूस्कार समारोह में भी नायक नायिकाओं से अंग्रेजी के शब्दों की हिंदी बताओ जैसे खेल रखे जाते थे| ट्रेन मायने क्या----  लौह पथ गामिनी| अतः खडी बोली ने बेहतर अभिव्यक्ति का माध्यम बन, जनता के बीच जगह बनाई|
            स्त्रियों, दलितों, पिछड़ों जैसे हाशिये पर सिमटे लोगों की राजसत्ता में भागीदारी बढ़ने से जनसामान्य के बीच हिंदी बोली जाने लगी| इससे दो फायदे हुए एक तो हिंदी अखबारों के पाठक बढे और दूसरे- व्यवहार में आने वाली हिंदी के शब्दों में अधिकाँश की व्यत्पुत्ति का स्त्रोत संस्कृत नहीं था|
              विदेशी छात्रों की हिंदी सीखने की संख्या बढ़ी जिसमें अधिक संख्या में चीनी छात्र भाग लेते हैं ताकि चीन में हिंदी जानने वाले  नौजवान तैयार किये जा सके, जिनके ज़रिये भारतीय बाजारों में घुसा जा सके|
               सूचना प्रौद्ध्योगिकी के चलते भारतीय नौजवान चिन्नई, बंगलूरु, हैदराबाद, पूना जैसे महानगरों में गया है जिससे वहां पर हिंदी का प्रचार प्रसार ही नहीं बढ़ा है बल्कि तीज त्योहारों को भी  धूमधाम से मनाया जाने लगा है| इस प्रकार रोज़गार व बाज़ार की ज़रूरतों के कारण हिंदी आगे बढ़ पाई है|
                हिंदी की हनक क्लर्क से लेकर अफसर बनाने वाली प्रतियोगी परीक्षाओं में भी कायम हो गयी है| कर्मचारी चयन आयोग ने (सीजीएल) और (सीएच्एसएल) में निबंध व पत्र लेखन को अनिवार्य कर दिया है| लोक सेवा आयोग की सर्वोच्च सिविल सेवा व राज्य की पीसीएस परीक्षा में भी हिन्दी का काफी महत्त्व है| इसी कारण स्नातक में प्रवेश के वक्त हिन्दी की सीट सबसे पहले भरती हैं |
आज हिंदी के उत्थान के लिए हम क्या कर सकते है ------------
       हिंदी को दुनिया की विकसित भाषाओं के बीच अपनी  जगह सुरक्षित रखनी है तो हमें बहुत सचेत रहना होगा| खाली राजभाषा बनाकर ही खुश नहीं रहना है| देवनागरी लिपी के यूनीकोड से कम्पूटर और इंटरनेट पर हिंदी का चलन का रास्ता सुगम हो गया है| अब असली चुनौती है विज्ञान व तकनीक के माध्ययम भाषा के रूप में उसकी  विश्वसनीयता और प्रासंगिकता| यहीं पर हम हिंदी परिवार के सदस्य निढाल हो जाते हैं| ज़रूरत है तो बस मानसिकता बदलने की| इसकी शुरूआत घर से होनी चाहिए|
१.     बच्चों से हमेशा मातृभाषा में ही बात करें| हिन्दी किताबें, पत्र पत्रिकाएं खुद भी पढ़ें और बच्चों को भी पढने के लिए प्रेरित करें| आईसीसीआई बोर्ड ने भले ही मात्राओं की त्रुटियों पर नंबर नहीं काटने का फैसला लिया हो पर आप हमेशा सजग रहकर मात्रा सम्बन्धी त्रुटि पर बच्चे का ध्यान दिलाएं|
२.     यह रवैया कभी न रखें कि क्या ज़रूरत है हिंदी पर इतनी मेहनत करने की, बस परीक्षा में पास भर हो जाओ| आगे हिंदी कभी भी काम नहीं आने वाली| याद रखिये आपका यह रवैय्या राष्ट्रभाषा का अपमान है| यह अपराध आप तो कर ही रहे हैं,बच्चों में भी गलत संस्कार डाल रहे हैं|
३.     हिन्दी की पढ़ाई रोज़गार से जुडी होनी चाहिए नहीं तो प्राध्यापकी के अलावा और कोई विकल्प नहीं रह जाता| ख़ुशी की बात है कि अब रचनात्मक लेखन, अनुवाद, पटकथा लेखन, पत्रकारिता के क्षेत्र में हिंदी जाननेवालों की बहुत मांग है| हिंदी न्यूजचैनल पर नए उद्घोषकों ने बहुत अच्छा काम किया है|
४.     किसी भी विद्यार्थी, अधिकारी या कर्मचारी को हिंदी के लिए पुरुस्कृत करने का मापदंड केवल हिंदी दिवस में किये गए उत्कृष्ठ कार्य के लिए ही नहीं होना चाहिए| पूरे साल के दौरान किये गए कार्य से उसको जोड़ना चाहिए| प्रौन्नति में हिंदी में कार्यकुशलता को आधारबिन्दु बनाया जा सकता है, अतिरिक्त बोनस भी दिया जा सकता है|
५.     उन अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं के खिलाफ व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से पत्र लिखकर अभियान चलाना चाहिए और उन्हें कहना चाहिए कि इस प्रकार की हिंगलिश को अविलम्ब स्थगित करें (जो हिंदी में अंग्रेजी शब्द ज्यादा उपयोग में लाते हैं) नहीं तो हम सब आपकी पत्रिका या अखबार को पढ़ना बंद कर देंगे|
६.     व्हाट्सऐप, फेसबुक, क्वोरा आदि पर जो भी हम लिखें सब ज्यादा से ज्यादा हिंदी में हों| कोशिश करे खुद ही आज के विचार, अनमोल वचन, अपने अनुभव, मन की बात सब हिंदी में लिखे| मेहनत ज़रूर है पर उद्देश्य पूर्ण होगा|
७.     RIP, HBD जैसे शौर्टकट मारने की अपेक्षा हिंदी में अपनी प्रतिक्रिया को महत्व देना, आपको ही सिखाना है| हाल ही में फेसबुक पर लघुकथा के परिंदेके मंच पर पाठकों को इमोजी के बजाय अपनी प्रतिक्रियाएं लिखकर देने का अनुरोध किया गया है|
८.     भाषा संस्कृति से जुडी है अतः तीज त्योहारों के बारे में अधिक से अधिक जानकारी परिवार के सदस्यों को दें| जैसे अब गणेश पूजा महाराष्ट्र का त्यौहार न होकर पूरे देश का हो गया है| छठ बिहार से निकलकर पूरे देश में मनने लगी है|
९. जन्मदिन ,वैवाहिक वर्षगाँठ आदि पर शुभ सन्देश, आशीर्वाद सब हिन्दी में ही लिखें| विवाह के निमंत्रण पत्र हिंदी में लिखें|
१०. अपने हस्ताक्षर हिन्दी में करें|
              इस प्रकार हम देखते है हिंदी अभी तक मनोरंजन की भाषा है ,खरीददार की भाषा है,बाज़ार की भाषा है| अब इस हिन्दी को शोध व उत्पादन की भाषा बनाना है| जो हिंदी अपने आधार पर मजबूत है वह शिखर पर शायद नदारद हो जाती है| आधार की इस भाषा को शिखर की सोच में बदलना ही सबसे बड़ा काम है| यह भी  होगा ज़रूर होगा क्योंकि अब हिंदी समय से जुड़ रही है समय के बदलावों से जुड़ रही है| अपने देश में मौलिक चिंतन और सृजन की अनवरत यात्रा केवल और केवल हिंदी से ही हो सकती है|
मनीषा सक्सेना
जी १७ बेल्वेडीयर प्रेस कम्पाउंड
प्रयागराज २११००२
http://manishaasblog.blogspot.com/                   



3 comments:

  1. बहुत सुंदर। सोचने पर मजबूर करनेवाला लेख।सु व,।

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    1. आपका आशीर्वाद है पापा जो इतना कर पाई।

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  2. Sundar। सोचने पर मजबूर करनेवाला लेख।

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